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तो क्या सरकार डाल रही है इस घोटाले पर पर्दा?
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 02 Jan 2014 08:42 AM IST
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एनआरएचएम के तहत उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में दवा खरीद में एक बड़ा घोटाला कई बार जांच होने के बाद भी दबाया जा रहा है।
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जांच रिपोर्ट में वित्तीय गड़बड़ी का खुलासा
अब तक दो आईएएस अफसरों के अलावा एक निदेशक ने अपने अपने स्तर पर जांच रिपोर्ट सौंपी है। सरकार ने किसी भी जांच को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई है, जबकि एक जांच रिपोर्ट में तो दोषी चिन्हित कर वित्तीय गड़बड़ी का खुलासा हुआ।
सीएजी (कंट्रोलर आडिटर जनरल) के प्रकियाधीन एनआरएचएम परफार्मेंस आडिट में दवा खरीद में गड़बड़ी को चिहिन्त किया गया है। सूत्रों की माने तो घोटाले के तार विभागीय अधिकारियों के अलावा राजनीतिक स्तर से भी जुड़े हैं। जिसके चलते प्रत्येक जांच रिपोर्ट फाइलों में दफन होकर रह गई।
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पांच बरस पहले भाजपा सरकार के कार्यकाल में स्वास्थ्य महकमा रुड़की वेयर हाउस में मिली 22 लाख रुपए की दवाओं से जोड़कर इसे घोटाले नहीं बल्कि प्रक्रियात्मक गड़बड़ी बता कर ढांपा जाता रहा है।
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सिर्फ एक्सपायर दवाओं की जांच
2009 में मामला उजागर होने के बाद तत्कालीन वित्त सचिव एलएम पंत को प्रकरण की जांच सौंपी गई। जांच सिर्फ एक्सपायर दवाओं की हुई, जिसमें सौंपी रिपोर्ट में सिर्फ प्रक्रियात्मक गड़बड़ियां चिन्हित की गई।
इसके बाद निदेशक राष्ट्रीय कार्यक्रम ने मामले की जांच की तो उन्होंने भी दवाएं खरीद से लेकर उसके वितरण को लेकर अपनाई प्रक्रिया में गड़बड़ियां पाईं।
इन रिपोर्टों पर विभाग स्तर से कोई संज्ञान नहीं लिया गया कि आखिर प्रक्रियात्मक गड़बड़ी कैसे हुई। कोई दोषी साबित नहीं किया गया और मामला 2013 तक फाइलों में दफन होकर रह गया।
क्लीन चिट से उठाया पर्दा
पहले हुई दो जांच में गड़बड़ियां पकड़ में आने के बाद भी तत्कालीन अधिकारियों को क्लीन चिट देने पर अप्रैल 2013 में आईएएस पीयूष सिंह की रिपोर्ट ने पर्दा उठाया।
रिपोर्ट से पहली बार घोटाला साबित हुआ जिसमें 1.21 करोड़ रुपए की अनियमितता सामने आई। जांच रिपोर्ट में मुख्य आरोपी तत्कालीन संयुक्त निदेशक (आरसीएच) डॉ. आशा माथुर (बाद में डीजी बनी) सहित पांच सीएमओ, फार्मासिस्ट और ड्राईवर दोषी चिन्हित कर रिकवरी की संस्तुति दी गई।
जांच रिपोर्ट से उठे नए सवाल
जांच में सबसे अहम बिंदू यह निकल कर आया है कि दवाओं की खरीद में अपनाई गई प्रक्रिया भी दोषपूर्ण थी। लगभग 11 करोड़ 40 लाख की कुल दवाएं खरीदी गई थी, जिसका हिस्सा एक्सपायर्ड हुई गर्भवति महिलाओं की मेडिकल किट है। किट में रखी जाने वाली दवाओं के निर्धारण से लेकर उसकी खरीद को लेकर मानकों को नजरादांज किया गया।