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आपदा से बचाव के लिए गंगा बेसिन की नदियों पर होगा शोध
अंकित कुमार गर्ग/ अमर उजाला, रुड़की
Updated Wed, 23 Dec 2015 01:43 PM IST
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हिमालय से गंगा बेसिन में आकर मिलने वाली पांच नदियों में भारी बारिश, बादल फटने, भूस्खलन और हिमनदों की झीलों में विस्फोट के बाद आने वाली आपदा से बचाव के लिए इन नदियों के आकृति विज्ञान (मार्फोलॉजी) पर अध्ययन का काम शुरू कर दिया गया है।
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विश्व बैंक परियोजना के अंतर्गत राज्य सरकार की ओर से डेनमार्क बेस्ड डीएचआई वाटर एंड एनवायरमेंट प्राइवेट लिमिटेड को सौंपे गए इस अध्ययन कार्य के लिए गठित टास्क कमेटी में आईआईटी के वैज्ञानिकों की भूमिका अहम होगी। हिमालयी नदियों में प्राकृतिक प्रकोप के बाद गंगा में आने वाले उफान का असर पहाड़ी इलाकों सहित मैदानी क्षेत्रों पर कहर बनकर टूटता है।
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वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालयी क्षेत्र की नदियों पर प्राकृतिक आपदाओं की प्रवृत्ति में अंतर आ रहा है। जिसके चलते अब नए सिरे से गंगा बेसिन की नदियों के आकृति विज्ञान का अध्ययन किया जा रहा है। ताकि भविष्य में आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए आपदाओं को नियंत्रित किया जा सके।
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इसके तहत होने वाले कार्यों के लिए विश्व बैंक परियोजना के साथ डीएचआई कंपनी को 13 करोड़ की अनुमानित लागत का कार्य 22 महीनों में पूरा करना होगा। राज्य सरकार की ओर से इस कार्य के लिए एक टास्क कमेटी गठित की गई है। जिसमें आईआईटी सिविल विभाग के प्रो. जैड अहमद और आईआईआरएस देहरादून के डा. पीके चंपाती सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल किया गया है।
इसके अलावा कंपनी की ओर से आईआईटी के वैज्ञानिक डा. नयन शर्मा को बतौर सलाहकार शामिल किया गया है। योजना के तहत अध्ययन के तहत ऐसे कार्य किए जाएंगे जो अपस्ट्रीम जलाशयों में अचानक बाढ़ के निर्वहन के लिए तरीके इजाद करेगा। साथ ही नदियों के कटाव को रोकने, किनारों को स्थिर रखने और आपदा के मद्देनजर नदियों की आकृति और फैलाव के मानकों को निर्धारित किया जाएगा।
इन नदियों के आकृति विज्ञान पर होगा अध्ययन
भागीरथी - गंगोत्री से देवप्रयाग - 205 किलामीटर
मंदाकिनी - केदारनाथ से रुद्रप्रयाग - 98 किलोमीटर
अलकनंदा - बद्रीनाथ से देवप्रयाग - 190 किलोमीटर
धौलीगंगा - तवाघाट से जौलजीबी - 40 किलोमीटर
काली नदी - जौलजीबी से पंचेश्वर - 55 किलामीटर