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ना कुर्सी ना मेज फिर भी ऑफिस...
देहरादून/रजा शास्त्री
Updated Wed, 24 Jul 2013 09:41 AM IST
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केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय दिल्ली और फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) के पाटों के बीच में मंत्रालय का उत्तराखंड में खुलने वाला रीजनल कैंप आफिस पिस गया है। रीजनल कैंप आफिस के नाम पर अभी एफआरआई में एक कमरा भर ही खुला है जिसमें फर्नीचर के नाम पर अधिकारियों को बैठने के लिए कुछ नहीं दिया गया है।
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विभिन्न मामलों की कीमती फाइलें जमीन पर लावारिस सामान सी पड़ी हैं और डीलिंग असिस्टेंट इन्हीं पर बैठकर सुस्ताते हैं। इस दफ्तर को सोमवार से खुलना था। अधिकारी स्टाफ को लेकर शनिवार को लखनऊ से यहां आ गए थे।
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स्टाफ का कहना है कि एफआरआई ने पहले तो भवन देने से ही मना किया। बात वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची तो एक कमरे की चाबी दे दी गई। फर्नीचर की बात चली तो कहा गया कि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय दिल्ली देगा।
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सोमवार को खुलना था आफिस
मंत्रालय ने कहा कि एफआरआई देगा। इस चक्कर में डिप्टी कंजर्वेटर फोरेस्ट (डीसीएफ) अमित मिश्र रविवार को लौट गए। लखनऊ से आईं तीन सौ फाइलें एफआरआई के सीलन भरे कमरे में नीचे पड़ी रहीं। सोमवार को आफिस खुलना था, लेकिन कुछ नहीं हो पाया।
मंगलवार को डीसीएफ मिश्र वापस आए। तब भी यही झगड़ा फंसा रहा कि कुरसी मेज नहीं तो स्टाफ कहां बैठेगा। शाम को डीसीएफ मिश्र ने फिर शासन के नोडल अधिकारी से बात की तो बहुत माथापच्ची के बाद एफआरआई फर्नीचर देने को राजी हुआ।
शासन के दबाव में हुई डीसीएफ के रहने की व्यवस्था
शाम तक फर्नीचर स्टोर में ढूंढा जाता रहा। शासन के दबाव में डीसीएफ के रहने की व्यवस्था न्यू साइंटिस्ट हॉस्टल में कर दी गई। मिश्र ने बताया कि वह अपना वाहन लेकर लखनऊ से आए थे। साथ ही बताया कि रीजनल कैंप आफिस का स्टाफ तीन सौ फाइलें अपने साथ लाया था।
इनमें अधिकांश फाइलों को सैद्धांतिक स्वीकृति के लिए दिल्ली भेजा जाना है। कुछ फाइलों में क्वेरी लगी हुई है। उत्तराखंड के जिलों की निरस्त फाइलें अभी लखनऊ में ही पड़ी हैं। स्टाफ का कहना है कि एफआरआई के दफ्तर में काम शुरु होेने में एक हफ्ता लग जाएगा।
हॉस्टल में तीन फाइलें निपटाईं
दफ्तर में कोई व्यवस्था न होने पर डिप्टी फोरेस्ट कंजर्वेटर अमित मिश्र ने न्यू साइंटिस्ट हॉस्टल में फाइलें निपटाने का काम शुरु कर दिया। मंगलवार को तीन फाइलें निपटाईं। इनमें पहली फाइल बल्लूपुर चौक के सड़कों के किनारे बाइंडिंग की थी।
बाकी फाइलें ग्रामीण इलाकों की सड़कों की थीं। मिश्र का कहना है कि दफ्तर पहुंचने में अभी दो-तीन तो लग ही जाएंगे। उन्होंने बताया कि यह रीजनल कैंप आफिस है। आपदा के मद्देनजर इसे खोला गया है। वैसे अब आफिस यहीं रहेगा।