{"_id":"590c1cfd4f1c1baa5a44140e","slug":"rambara-destroyed-in-kedarnath-disaster","type":"story","status":"publish","title_hn":"यादों में बसे रामबाड़ा को देख भर आई आंखें...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यादों में बसे रामबाड़ा को देख भर आई आंखें...
विनय बहुगुणा/ अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
Updated Fri, 05 May 2017 12:04 PM IST
विज्ञापन
rambara
- फोटो : amarujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आपदा से पहले दिन-रात चहकने वाले रामबाड़ा को देख केदार भक्तों की आंखें भर आई। केदारनाथ यात्रा का यह महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2013 की आपदा में तबाह हो चुका है लेकिन केदार दर्शन को पहुंच रहे भक्तों के दिलों में यह पड़ाव आज भी मौजूद है।
विज्ञापन
बाबा केदार की यात्रा में कभी श्रद्धालुओं को ठहरने का आग्रह करने वाला रामबाड़ा आज वीरान हैं। कभी 24 घंटे उल्लास और उमंग से भरपूर रहने वाले इस पड़ाव में आज रेत और बोल्डर बिखरे पड़े हैं। पैदल मार्ग पर आवाजाही बदस्तूर जारी है, लेकिन रामबाड़ा खामोश है। मंदाकिनी नदी का तेज शोर भी यहां पसरे सन्नाटे को नहीं तोड़ पा रहा है।
विज्ञापन
यहां पहुंचते ही शिव भक्तों की आंखें यहां पर बिताए पलों को याद कर भर आती हैं। दिल्ली से बेटे के साथ बाबा केदार के दर्शनों को पहुंची सुभद्रा देवी ने बताया कि वे वर्ष 2010 में परिवार के साथ बाबा केदार के धाम आई थी। तब, रामाबाड़ा में ही उन्होंने रात्रि प्रवास हुआ था। हंसी-ठिठोली के साथ स्थानीय लोगों के साथ बिताए पल आज भी याद आते हैं। आज रामबाड़ा के मंजर को देख उनकी आंखें नम हो गई।
विज्ञापन
श्रद्धालु प्रदीप कुमार, रेशमा साही, नरोत्तम गांगुली, लक्ष्मी दास ने भावुक होते हुए बताया कि वर्ष 2005 से वे हर वर्ष बाबा केदार के धाम पहुंच रहे हैं। वर्ष 2007, 2008, और 2011 में उन्हें रामाबाड़ा में रात्रि प्रवास करना पड़ा था। सब कमरे बुक थे। बैठने तक की भी जगह नहीं थी। ऐसे में पूरी रात स्थानीय दुकानदारों और अन्य यात्रियों के साथ हंसी-मजाक और बातचीत में बीत गई।
वे पिछले तीन वर्षों से भी पैदल यात्रा कर रहे हैं, लेकिन रामबाड़ा नजर नहीं आ रहा। चारों तरफ वीरानी छाई है। रेत और बोल्डरों के बीच उन बिताए पलों को वह ढूंढ रहे हैं। वे बोले, हमारे लिए रामबाड़ा को भूलना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सरकार को रामबाड़ा को पुन: बसाने के लिए योजना बनानी चाहिए।
फाइलों में सिमटा स्मृति वन
रामबाड़ा को यादों में जीवित रखने और आपदा में मारे गए लोगों की याद में इस स्थान पर स्मृति वन की स्थापना का निर्णय लिया गया था। वर्ष 2014 में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत और स्वामी चिदानंद ने रामबाड़ा में रुद्राक्ष के पौधे का रोपण भी किया था, लेकिन तब से न तो रोपित पौधा देखा गया और न पड़ाव को बसाने या सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार की योजना बन पाई।