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अफसरों को सताया डर तो पहुंचे मानवाधिकार आयोग के सामने

Fri, 22 Jul 2016 03:30 AM IST
मनीष चंद्र भट्ट/अमर उजाला, देहरादून
मनीष चंद्र भट्ट/अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 22 Jul 2016 03:30 AM IST
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railway officers appear before human right commission.
ऑफिसर - फोटो : demo pics

ट्रेन में उपचार के अभाव में बच्ची की मौत पर मानवाधिकार आयोग के नोटिस का जवाब देने से बच रहे अफसरों को अवमानना का डर दिखा तो वे दून चले आए। रेलवे अफसरों ने आयोग में दलील दी कि उन्हें अब तक कोई नोटिस नहीं मिले हैं। आयोग के हर ट्रेन में डॉक्टर और प्रत्येक कोच में फर्स्ट एड बॉक्स लगाने को रेलवे द्वारा पालिसी मैटर बताने पर, आयोग ने इसे रेलवे बोर्ड, नई दिल्ली को भेजने की भी सिफारिश की है।

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बीते 16 जनवरी को चमोली निवासी आरपी सिंह की पोती की शताब्दी एक्सप्रेस में दून से दिल्ली जाते वक्त इलाज न मिलने के कारण मौत हो गई थी। नेहरू कॉलोनी निवासी भूपेंद्र कुमार ने उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग में इसकी शिकायत की थी।
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आयोग ने लापरवाही मानते हुए रेलवे पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाने और यह रकम पीड़ित परिवार को देने और देहरादून से संचालित सभी ट्रेनों में एक डॉक्टर और फर्स्ट एड बाक्स लगाने के आदेश दिए थे।
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डीआरएम मुरादाबाद रेल मंडल की ओर से कई बार नोटिस के बावजूद जवाब न देने पर शिकायतकर्ता के हवाले से अमर उजाला ने आठ जुलाई के अंक में अवमानना का वाद दाखिल करने से संबंधित समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया। उत्तर रेलवे के नई दिल्ली और मुरादाबाद मंडल प्रशासन को पता लगा तो अफसरों को दून भेजकर आयोग में पक्ष रखने को कहा। उत्तर रेलवे के अधिवक्ता पराग कुमार ने कहा कि रेलवे को नोटिस मिले ही नहीं हैं। चीफ लॉ असिस्टेंट दुष्यंत कुमार ने बताया कि चलती ट्रेन में गार्ड के डिब्बे में फर्स्ट एड बॉक्स होता है। 

 

इमरजेंसी में मेडिकल सुविधा देना भी रेलवे की जिम्मेदारी
मामले की सुनवाई करते हुए आयोग की सदस्य डॉ. हेमलता ढौढ़ियाल ने कहा कि देश भर में विभिन्न ट्रेनों में हर रोज लाखों यात्री सफर करते हैं। उन्हें सुरक्षा और विभिन्न सुविधाएं देने के साथ ही इमरजेंसी में मेडिकल सुविधा देना भी रेलवे की जिम्मेदारी है। रेलवे अधिवक्ता के इस तर्क कि, यह पालिसी मैटर है और रेलवे बोर्ड द्वारा इस बारे में नीति बनाई जाती है। इस पर शिकायतकर्ता को सुझाव दिया कि संबंधित प्रस्ताव को जरूरी कार्रवाई के लिए रेलवे बोर्ड, नई दिल्ली और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी भेजें। वहीं, पीड़ित बच्ची के परिजनों को 10,000 रुपये जुर्माना देने पर जवाब दाखिल करने के लिए रेलवे ने कुछ और वक्ता मांगा है।

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