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रेल बजट: कुमाऊं को सौगात, गढ़वाल खाली हाथ

Fri, 14 Feb 2014 01:54 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 14 Feb 2014 01:54 PM IST
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रेल मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने अंतरिम बजट पेश कर दिया, लेकिन इस पिटारे से गढ़वाल के हाथ मायूसी ही आई है। न तो यात्री सुविधाओं पर बात हुई और न ही रेल लाइन विस्तार पर।

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जिन दो नई एक्सप्रेस ट्रेनों रामनगर-चंडीगढ़, लखनऊ-काठगोदाम की घोषणा हुई, वह भी कुमाऊं को मिली है। ऐसे में स्थानीय वासी खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं।
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ट्रेन से हर दिन सफर करने वाले, इससे माल मंगाने वाले और विभाग की खिदमत करने वाले सभी निराश हैं। खास तौर पर सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ऋषिकेश, कर्णप्रयाग रेल लाइन पर कोई प्रावधान न होने से भारी निराशा है।

यह थी लोगों की चाह

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बीते दिन तक उम्मीदों की फेहरिस्त उठाए रेल मंत्री की तरफ टकटकी लगाने वाले अब बजट की खामियां गिना रहे हैं।

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उनका साफ कहना है कि यात्री किराया न बढ़ाकर बेशक रेल मंत्री ने जनता पर कोई नहीं लादा। लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ न किया जाना निगेटिव जा रहा है। बजट को वह 10 में से दो से तीन के बीच अंक देते हैं।

ये चाहते थे लोग
- सहारनपुर-देहरादून, चंडीगढ़-देहरादून रेल ट्रैक की ब्राड गेजिंग
- चार धाम यात्रा के लिए दक्षिण से एक विशेष ट्रेन की व्यवस्था
- दून रेलवे प्लेटफॉर्म पर सिक्योरिटी के मद्देनजर बजट में घोषणा

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- रेलवे यार्ड का विस्तार किया जाना ताकि ट्रेनों में ज्यादा कोच लग सकें
- रेलवे कॉलोनी की शिफ्टिंग के लिए बजट ताकि प्लेटफॉर्म का एक्सपेंशन हो
- ऋषिकेश-कर्णप्रयाग पर शिलान्यास से आगे भी कदम बढ़ाया जाए

...इन घोषणाओं पर अमल पता नहीं कब

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- रायवाला डोईवाला के बीच रेल बाईपास
- हरिद्वार-देहरादून के बीच डबल लाइन

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- नजीबाबाद-कोटद्वार के बीच डबल लाइन
- दून में स्किल डेवलपमेंट सेंटर की स्थापना

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग, कालसी अब तक सपना
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का सर्वे अंग्रेज पूरा कर चुके थे, लेकिन विश्व युद्ध शुरू हो जाने के कारण इस पर काम आगे नहीं बढ़ सका। इसके कुछ ही समय बाद देश आजाद हो गया।

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वह लाइन शिलान्यास का पत्थर लग चुकने के बावजूद अब तक काम शुरू होने की बाट जोह रही है। कालसी रेल लाइन भी सर्वे के बाद से अब तक काम आगे खिसकने के ही इंतजार में है।

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कुछ यही हाल देहरादून-सहारनपुर लाइन के सर्वे का भी है। यह शिलान्यास 1996 में हुआ था, लेकिन इसके बाद काम आगे नहीं बढ़ा।

चार धाम के लिए भी कुछ नहीं

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काफी समय से विशेष ट्रेन देहरादून-जगन्नाथपुरी चलाए जाने की मांग हो रही है।

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इसकी वजह यह है कि विशेष तौर पर चार धाम के दौरान उड़ीसा और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में लोग यहां का सफर करते हैं। लगभग 15-20 साल से इस मांग को अनसुना किया गया है। इस बार भी यह मांग अनसुनी रही।

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यात्री सुविधा को लेकर कोई बात बजट में हुई। न तो कोच से जुड़ी घोषणा है और न यार्ड को लेकर की राह में रेलवे कालोनी शिफ्टिंग का पेंच है। दून प्लेटफार्म पर सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त किया जाना बेहद जरूरी है।  
- राजेंद्र गुसाईं, उरमू

सुरंग में मजदूर न दबते तो दून से पहले मसूरी पहुंचती रेल

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अगर राजपुर में शहंशाही आश्रम से चंद मीटर आगे मसूरी टोल चौकी के पास सुरंग बनाते समय मजदूर दबे न होते तो रेल दून से पहले मसूरी पहुंचती।

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बकौल इतिहासकार गोपाल भारद्वाज वर्ष 1921 में हिंदुस्तान के कुछ राजा-रजवाड़ों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर मसूरी-देहरा ट्राम वे कंपनी बनाई। कंपनी ने 23 लाख रुपए की अनुमानित लागत से देहरादून से मसूरी रेल लाइन बिछाने का काम शुरू किया था।

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राजपुर शहंशाही आश्रम से कुछ आगे पुराने मसूरी टोल पर सुरंग बनाने का काम शुरू किया गया। लेकिन बताया जाता है कि सुरंग बनाते समय कुछ मजदूर दबकर मर गए और अन्य मजदूरों ने काम करना छोड़ दिया, जबकि कंपनी टोल तक पटरियां ला चुकी थी।

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दो साल मसूरी टोल से आगे सुरंग बनाने का काम भी चला। लेकिन वर्ष 1924 में इस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया। इसके बाद तय हुआ देहरादून से मसूरी को इलेक्ट्रिक ट्रेन ट्रैक बनाया जाए और ग्लोगी पावर हाउस से बिजली की सप्लाई की जाए।

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इसी रेल लाइन बिछाए जाने की प्रत्याशा में वर्ष 1888 में झड़ीपानी में ओक ग्रोव स्कूल की स्थापना की गई। लेकिन प्रोजेक्ट परवान नहीं चढ़ सका। आज भी ओकग्रोव स्कूल का संचालन उत्तरी रेलवे द्वारा किया जाता है।

1893 में व्यापारियों ने किया था विरोध

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मसूरी तक रेल बिछाने के मसौदे की बात करें तो इसे 1893 में तैयार किया गया था।

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उस वक्त बिटिश हुकूमत ने हर्रावाला से सीधे शंहशाही आश्रम होते हुए ओकग्रोव स्कूल, झड़ीपानी, बार्लोगंज के बाद कुलड़ी के पास हिमालय क्लब में स्टेशन बनाने का रोड मैप तैयार किया था।

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मगर उस वक्त देहरादून में अधिकांश इलाके में चाय और बासमती चावल की खेती होती थी। ये दोनों ही नकदी फसल के तौर प्रमुख व्यापार में शुमार था।

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लिहाजा, दून के व्यापारियों ने हर्रावाला से सीधे मसूरी रेल लाइन बिछाने का विरोध कर दिया। इस तरह पहली बार मसूरी रेल लाइन बिछाने की सोच को झटका लगा।

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