...तो राहुल का विस्तार है उनकी केदारनाथ यात्रा?
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राहुल की यह यात्रा क्या उनकी अंतर्यात्रा का विस्तार है? क्या राहुल खुद को किसी बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार कर रहे हैं? ये सवाल केदार यात्रा में किसी ने राहुल के सामने उठाए नहीं पर राहुल का हाव-भाव ऐसा था जो उनके पुरानी छवि से मेल नहीं खाता। राहुल केदारनाथ के कठिन मार्ग पर मानों संतुलन को साधने की ओर बढ़े।
उनके साथ रहे लोगों की मानें तो राहुल ने लिनचौली में वह सब कुछ किया जो जननेता लोगों के बीच में खुद को पाकर किया करते हैं। लोगों से बोलना-बतियाना, उनके बीच उठना-बैठना। ऐसे घुलना मिलना की साथ वाला भी खुद को सहज महसूस करे।
राहुल हालांकि ऐसा पहले भी करने की कोशिश करते रहे हैं पर केदारनाथ दो अलग-अलग धाराओं का मिश्रण भी है। एक धारा ऊंची बर्फीली चोटियों के बीच एंडवेंचर का अहसास कराती है जिसके लिए राहुल दयारा बुग्याल को पसंद करते रहे हैं। दूसरी धारा शिव स्तुति के लिए उमड़े लोगों का काफिला है जिनके बीच पहुंचने के लिए राहुल किसी गांव, किसी दलित के घर का रुख करते हैं। राहुल ने किसी भी धारा का अतिक्रमण करने की कोशिश नहीं की।
दूसरों के टेंट में बैठे रात एक बजे तक
रुद्राटॉप से केदारनाथ तक उनके लिए ऑल टेरेन व्हीकल (एटीवी बर्फ में चलने वाला एक वाहन) की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के लोगों ने बुधवार को बर्फबारी के बीच रास्ता तैयार किया था। राहुल इस वाहन पर नहीं बैठे। पैदल ही केदारनाथ पहुंचे। बाद में मुख्यमंत्री हरीश रावत जरूर इसमें सवार होकर केदारनाथ पहुंचे।
लिनचोली में राहुल रात को करीब एक बजे तक जागे। अपने टेंट को छोड़कर राहुल ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय, रंजीत रावत, विधायक ललित फर्सवाण आदि के साथ टेंट में कई विषयों पर बातचीत की।
करीब तीन घंटे की इस बातचीत में उन्होंने लोगों के सामने सवाल उठाए और खुद उन सवालों के जवाब भी दिए। एक कांग्रेसी के मुताबिक लिंचौली में शून्य तापमान के आसपास टेंट में राहुल के इर्द-गिर्द सिमटी मंडली खुद हैरान थी कि राहुल कितनी पैनी निगाह रखते हैं।
दो धाराओं के बीच साधा संतुलन
इससे पहले राहुल को उनके टेंट में खाना परोसा गया तो राहुल ने इनकार कर दिया। बाहर निकले और यात्रियों के साथ बैठकर खाना खाया।
मंडुवे की रोटी का स्वाद इतना भाया कि बगल में बैठे कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय से पूरी जानकारी ली और फिर से रोटी मांगी।
पर इस यात्रा में राहुल सुरक्षा कर्मियों के लिए परेशानी का सबब नहीं बने। सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश नहीं की। बेहद सहज पर अपने तक सीमित नहीं। इससे पहले राहुल 58 दिन तक अज्ञातवास में भी रहे और अज्ञातवास से बाहर निकले तो लोक सभा में सक्रिय हुए। राहुल ने शायद केदारनाथ यात्रा में दो धाराओं की अति के बीच एक संतुलित रास्ता हासिल करने की कोशिश की।