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पुष्कर फ्लॉवर भी और फायर भी: कुर्सी के दावेदार बड़े-बड़े दिग्गज फिर चित, मोदी-शाह की आंखों का तारा बने धामी

Wed, 23 Mar 2022 04:33 PM IST
रेनू सकलानी विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून
विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Wed, 23 Mar 2022 04:33 PM IST
सार

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गंगोलिहाट में चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि पुष्कर सिंह धामी का नाम सुनकर कांग्रेस के लोग समझते हैं कि ये पुष्कर तो फ्लॉवर है, लेकिन अपना पुष्कर फ्लॉवर भी है और फायर भी। हमारा पुष्कर न कभी झुकेगा, न कभी रूकेगा। धामी के साथ कड़े मुकाबले में भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गज भी चित हो गए।

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Pushkar is flower and fire too: Uttarakhand CM Dhami becomes the apple of Modi-Shah eyes
pushkar singh dhami - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद शुरू हुई मुख्यमंत्री की दौड़ आखिरकार पुष्कर सिंह धामी के नाम पर मुहर लगते ही खत्म हो गई। कड़े मुकाबले में बड़े-बड़े दिग्गज एक बार फिर चित हो गए तो पुष्कर चुनाव हारकर भी मोदी-शाह की आंखों का तारा बनने में कामयाब रहे। विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हार के बाद कई नाम सीएम की कुर्सी के लिए उछलने लगे थे।

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केंद्रीय नेताओं की परिक्रमा के साथ ही दिल्ली दरबार में बाकायदा लॉबिंग शुरू हो गई थी। दौड़ में शामिल नेताओं की ओर से विभिन्न चैनलों के माध्यम से अपने पक्ष में दावेदारी तक होने लगी थी। ताकि केंद्रीय नेतृत्व तक राज्य में उनकी स्वीकार्यता को प्रस्तुत किया जा सके। लेकिन आखिर में किसी भी कोई युक्ति काम नहीं आई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गंगोलिहाट में चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि अपना पुष्कर फ्लॉवर भी है और फायर भी। ऐसे ही भाजपा ने चुनाव हारने के बावजूद धामी को फिर कमान नहीं सौंपी। 
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सतपाल महाराज के आगे फिर आड़े आई कांग्रेस पृष्ठभूमि
युवा चेहरा होने के बावजूद धामी शुरू से पसंद रहे हैं। मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल रहे दिग्गज नेता सतपाल महाराज कैबिनेट मंत्री भी रहे, लेकिन उनकी कांग्रेस पृष्ठभूमि फिर आड़े आ गई। सीएम रेस में प्रेमचंद अग्रवाल का नाम भी लिया जा रहा था, वह लगातार चौथी बार विधानसभा पहुंचे हैं। वह विधानसभा अध्यक्ष रहे हैं। लेकिन पार्टी ने मुख्यमंत्री के लिए उन्हें मुफीद नहीं पाया। दलित चेहरे के तौर पर विधायक खजान दास का नाम भी मुख्यमंत्री के लिए आगे किया जा रहा था, लेकिन उनकी दावेदारी भी केंद्रीय नेतृत्व को प्रभावित नहीं कर सकी।
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ये भी पढ़ें...यूनिफॉर्म सिविल कोड: विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद धामी ने कहा- चुनाव से पहले किया था वादा, जल्द शुरू करेंगे प्रक्रिया

इसके बाद कहा जा रहा था कि वर्ष 2024 के चुनाव को देखते हुए पार्टी महिला कार्ड भी खेल सकती है, इसमें पूर्व कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य और दूसरी बार विधायक बनी ऋतु खंडूड़ी का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा था, लेकिन महिलाएं भी मुख्यमंत्री की दौड़ में पिछड़ गईं। वहीं, एक धड़ा पार्टी संगठन की कमान संभाल रहे मदन कौशिक को भी सीएम बनाने जाने की पैरवी कर रहा था, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव होने के बावजूद मैदानी पृष्ठभूमि का होना, उनके रास्ते का कांटा बन गया।

हर बार की तरह इस बार भी मुख्यमंत्री की दौड़ में डॉ.धन सिंह रावत का नाम भी जोर-शोर से लिया जा रहा था, लेकिन बेहद मामूली अंतर की जीत संभवत: इस बार उनके रास्ते का रोड़ा बन गई। इसके अलावा गणेश जोशी की सैन्य पृष्ठभूमि को आगे रखकर उन्हें भी सीएम दौड़ में शामिल बताया जा रहा था। इस चुनाव में प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल रहे सांसद रमेश पोखरियाल निशंक और अजय भट्ट का नाम भी प्रमुख दावेदारों में शुमार किया जा रहा था, लेकिन लोस सदस्य को चुने जाने से पार्टी को दो-दो उपचुनाव में जाना पड़ता।

चुनाव में मोदी के साथ धामी भी थे चेहरा, मिला फायदा

भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ धामी के युवा चेहरे को भी आगे रखकर चुनाव लड़ा था। पीएम मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह समेत तमाम बड़े नेता चुनावी जनसभाओं में धामी को ही प्रोजेक्ट करके चल रहे थे। पार्टी सूत्रों की मानें तो लगातार तीन-तीन मुख्यमंत्री देकर इस बार पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाकर फिर से कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। वर्ष 2024 के चुनाव को देखते हुए भी धामी ही सभी फेक्टर के हिसाब से फिट बैठ रहे थे। 

धामी के विरोध में पेश किए गए कई तर्क 
पुष्कर सिंह धामी के खटीमा से चुनाव हारने के बाद सीएम कुर्सी के तलबगार नेताओं ने अपनी दावेदारी पेश करने के साथ हारे व्यक्ति को कमान नहीं सौंपने के तर्क भी पेश किए। पड़ोसी राज्य हिमाचल में धूमल की हार के बाद विधायक जयराम ठाकुर को सीएम बनाने का भी तर्क दिया गया।

पश्चिमी बंगाल में चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी के सीएम बनने पर भाजपा ने विरोध किया था, इसकी भी याद दिलाई गई। कुल मिलाकर धामी की राह में तमाम रोड़े अटकाने का काम किया गया, लेकिन कुछ काम नहीं आया। इधर, उत्तर प्रदेश में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की हार के बाद भी उन्हें सरकार में शामिल किया गया। मौर्य की यह ताजपोशी धामी के लिए भी संजीवनी बनी।

कोश्यारी के दिल्ली प्रवास ने भी बनाया माहौल को अनुकूल
धामी की पुन: ताजपोशी को रोकने के लिए पार्टी के भीतर ही एक लॉबी सक्रिय थी, इसके लिए दस दिन सत्ता की चालें चली गईं। इस बीच, धामी के राजनीतिक गुरु व महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के दिल्ली प्रवास ने काफी हद ताक माहौल को धामी के अनुकूल बना दिया। बताया जा रहा है कि कोश्यारी ने धामी के पक्ष में माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
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