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...जब उत्तराखंड विधानसभा में राष्ट्रपति गाने लगे गीत

Tue, 19 May 2015 04:03 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 19 May 2015 04:03 PM IST
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president of india sung a song uttarakhand assembly.

उत्तराखंड विधानसभा में विशेष सत्र के दौरान राष्ट्रपति के संबोधन से भी जाहिर हुआ कि जन के साथ जंगल प्रदेश की धरोहर हैं।

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उत्तराखंड के रैनी गांव की गौरा देवी और पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा के बहाने चिपको का जिक्र, वन पंचायतों की देश की एकमात्र व्यवस्था पर राष्ट्रपति का ध्यान यूं ही नहीं गया।

राष्ट्रपति ने चिपको का गीत ‘जल है हमारा, जमीन है हमारी, जंगल है हमारा, उन्हें हमारे पूर्वजों ने रोपा है, अब हमें ही उनकी रक्षा करनी होगी’ भी सुनाया। राष्ट्रपति ने यह जिक्र उस राज्य के लिए किया जिसके लिए जंगल एक ऐसी धरोहर है जिसे विकास में बाधा बताया जा रहा है।
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वन संरक्षण की ऐवज में उसे ग्रीन बोनस की दरकार है। प्रदेश की 27 हजार मेगावाट ऊर्जा क्षमता का उपयोग न हो पाने की एक वजह वन संरक्षण बताई जा रही है। वन पंचायतें हाशिए पर हैं।
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अपने संबोधन में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पिछले 14 साल से चली आ रही विसंगति की ओर भी ध्यान दिलाया। बेहद शालीन शब्दों में राष्ट्रपति ने विकास में पीछे छूट गए प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र की ओर भी इशारा किया। राष्ट्रपति का संबोधन यह बताने के लिए भी काफी था कि पर्यावरण संरक्षण उत्तराखंड के लिए बेहद जरूरी है और प्रदेश की बहुत सी धरोहर वन संपदा से ही जुड़ती हैं।

विशेष सत्र में राष्ट्रपति ने कहा कि उत्तराखंड ने दस प्रतिशत की औसत आर्थिक विकास दर हासिल की है, लेकिन पहाड़ की इसमें पूरी भागीदारी नहीं हो पाई। 2003 में विशेष औद्योगिक पैकेज के घोषित होते ही तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने उद्योगों को विकास का आधार बनाने की नीति लागू की थी।

2007 तक प्रदेश को इसके परिणाम भी मिल गए थे। दस प्रतिशत की आर्थिक विकास दर तो प्रदेश को मिली पर पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा का राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी प्रदेश में उभरकर सामने आया। तब से यह मुद्दा लगातार बना हुआ है। यह उस राज्य का हाल है कि जिसके दस जिले सीधे तौर पर पर्वतीय हैं। राष्ट्रपति जाने-अनजाने इस विसंगति के बहाने प्रदेश के विकास पर भी टिप्पणी कर गए।

मेघालय का संयोग उत्तराखंड विधानसभा में

president of india sung a song uttarakhand assembly.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के उत्तराखंड विधानसभा में संबोधन के दौरान अजब संयोग रहा। 21 अक्तूबर 2013 को राष्ट्रपति मुखर्जी ने जब मेघालय में सदन को संबोधित किया तब उनके बगल में उत्तराखंड के राज्यपाल कृष्णकांत पॉल ही थे।

राज्यपाल पॉल को यह दूसरा अवसर मिला जब उन्होंने संसदीय कार्यप्रणाली पर राष्ट्रपति के विधानसभा संबोधन पर बगल की कुर्सी सांझा की। अब तक राष्ट्रपति के संबोधनों में विधानसभाओं को लंबे समय तक सदन की कार्यप्रणाली चलाने के साथ वित्तीय मामलों पर अधिक चर्चा करने पर जोर रहा।

मेघालय में राष्ट्रपति के संबोधन और उत्तराखंड सदन में दिए संबोधन में काफी हद तक समानता रही। इससे पहले राष्ट्रपति मेघालय समेत चार अन्य राज्यों उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश और केरल की विधानसभाओं को संबोधित कर चुके हैं। राष्ट्रपति ने प्रत्येक विधानसभा संबोधन में एक वर्ष में न्यूनतम 100 दिन सत्र चलाने की बात कही है।

मेघालय में उनके संबोधन में इस बात पर जोर दिया गया कि कराधान और वित्तीय मामलों लंबी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि वित्तीय मसलों पर विधानसभाओं में समय नहीं दिया जा रहा। उन्होंने वित्तीय मामलों में लंबी बहस का सुझाव रखा।

30 अक्तूबर 2012 में केरल विधानसभा में 125 वें स्थापना दिवस पर राष्ट्रपति प्रणब का संबोधन सर्वाधिक लंबा रहा। विधानसभा में उन्होंने सदन को अधिक समय तक चलाने पर तो जोर दिया, लेकिन एक सुझाव भी रखा कि क्या यह संभव है कि बजट पारित होने के बाद उन मांगों की स्क्रूटनी की जा सके जो महालेखाकार या लोकलेखा समिति की निगाह से बच जाती हैं। उनका आशय वित्तीय मामलों पर सदन की जवाबदेही अधिक बनाने को लेकर रहा।


उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि विधानसभाओं में वित्तीय मामलों के विधयकों पर चर्चा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। एक अध्ययन के मुताबिक पहली और दूसरी लोकसभा में वित्तीय मामलों पर कुल समय का दो तिहाई हिस्सा दिया गया।

यह तब है जबकि 1947 में लाया गया बजट केवल 293 करोड़ रुपए का था और 2012 में जो बजट लाया गया वह 12 लाख करोड़ का था। 8 जनवरी 2013 को उत्तर प्रदेश विधानसभा और 24 मई 2013 को हिमाचल प्रदेश विधानसभा में राष्ट्रपति ने संसदीय कार्यप्रणाली बेहतर बनाने की बात कही।

आपदा से उबरकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ उत्तराखंड

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उत्तराखंड विधानसभा में राष्ट्रपति के आगमन पर अपने संबोधन में राज्यपाल कृष्णकांत पॉल ने कहा कि आपदा के बाद राज्य के प्रति बनी धारणा को पार पाने में सफलता मिली है। आपदा से उबरकर प्रदेश दोबारा अपने पैरों पर खड़ा हुआ और तीर्थ यात्रियों-पर्यटकों के स्वागत के लिए तैयार है।

आपदा और कठिन परिस्थितियों के बावजूद प्रदेश के नागरिकों को जुझारू और जागरूक बताया। उन्होंने कहा कि राज्य के नागरिकों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा और जिम्मेदारी का पूरा एहसास है। राज्यपाल ने विधानसभा सदस्यों की कार्यप्रणाली की तारीफ की।

उन्होंने कहा कि राज्य गठन के बाद से प्रारंभिक चुनौतियों के साथ ही प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए प्रदेश निरंतर मजबूत हो रहा है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद विधानसभा चुनाव वर्ष 2002 में 54.21 प्रतिशत, 2007 में 63.96 प्रतिशत और 2012 में 73 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि लोकसभा आम चुनाव वर्ष 2004 में 48.74 प्रतिशत, वर्ष 2009 में 53.96 प्रतिशत और 2014 में 62.15 प्रतिशत मतदान ने यह साबित किया है कि नागरिकों को लोकतांत्रिक व्यवस्था में अत्यधिक विश्वास है।

प्रदेश में पुरुषों के मुकाबले महिला मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी को राज्यपाल ने उनकी जागरूकता तथा लोकतंत्र के प्रति आस्था बताया। उन्होंने कहा कि राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा, बेरोजगारी, पलायन, चिकित्सा एवं शिक्षण सुविधाओं के अभाव की चुनौतियों के बावजूद राज्य आंदोलनकारियों के सपनों को पूरा करने के प्रयास जारी हैं।

भरपूर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन विकास के लिए अहम हैं। उन्होंने गैरसैंण में विधानभवन निर्माण को विकास से जोड़ा। प्रदेश के विधानसभा सदस्यों को उत्तरदायित्वों के प्रति सजग बताया।

आपदा के बाद की स्थितियों पर राज्यपाल ने कहा कि वर्ष 2013 की आपदा के कारण देश दुनिया में उत्तराखंड के प्रति जो धारणा बन गई थी हमने उसे चुनौती के रूप में लिया। आपदा से पहले का वैभव वापस लाने तथा यहां आने वाले प्रत्येक पर्यटक और तीर्थयात्री के सुरक्षित व सुविधाजनक स्वागत के लिए हम पूरी तरह से तैयार हैं।

पुनर्निर्माण, विस्थापन और पलायन सबसे बड़ी चुनौती

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के आगमन पर विधानसभा में आयोजित विशेष सत्र में अपने संबोधन में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आपदा के बाद पुनर्निर्माण के साथ संकटग्रस्त गांवों का विस्थापन है।

पुनर्वास की जद में आए 350 गांवों का सुरक्षित स्थान पर विस्थापन राज्य के सम्मुख सबसे बड़ा सवाल है। पर्वतीय जिलों से बढ़ते पलायन पर चिंता जताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों से पलायन को रोकना राष्ट्रीय आवश्यकता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विगत वर्षों के दौरान हमने आपदा की भयावह त्रासदी झेली है। केदारनाथ धाम में चल रहा पुनर्निर्माण का काम सामूहिक संकल्प का द्योतक है। मुख्यमंत्री ने माना कि त्रासदी से उबरने और तेजी से आगे बढ़ने में समय लगेगा। प्रदेश के सामने पुनर्निर्माण की कठिन चुनौती है।

राज्य को गंगा-यमुना का मायका बताते हुए मुख्यमंत्री ने वर्षा के जल संरक्षण पर बोनस देने की नीति, हरित उत्तराखंड के लिए वृक्षारोपण पर नकद प्रोत्साहन राशि जैसी राज्य की पर्यावरण मित्र छवि का रखा।

मुख्यमंत्री ने सीमांत क्षेत्रों में पलायन की समस्या को रखते हुए कहा कि प्रदेश का विशाल भूभाग चीन और नेपाल की सीमा से लगा है। सीमांत क्षेत्र के निरंतर खाली होते गांव किसी भी मुख्यमंत्री की चिंता को बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं।

सरकार पलायन रोकने के लिए प्रयास कर रही है। उन्होंने पलायन, विस्थापन और पुनर्निर्माण के मुद्दों को रखते हुए संकेत दिए कि इसके लिए केंद्र से सहयोग की अपेक्षा है।

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