उत्तराखंडः ऐतिहासिक युद्ध के लिए तैयार होने लगी सेनाएं!
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उत्तराखंड के देवीधुरा में 29 अगस्त को होने वाले ऐतिहासिक पाषाण युद्ध के लिए चार खामों और सात थोकों की सेनाएं तैयार होने लगी हैं।
यहां का ऐतिहासिक खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान एक बार फिर से प्रसिद्ध बग्वाल युद्ध के लिए सजने लगा है। इस मैदान में रक्षाबंधन के दिन पत्थर मार युद्ध की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा एक बार फिर से जीवंत रूप लेगी।
हालांकि बीते दो सालों से यहां बग्वाल के स्वरूप में थोड़ा बदलाव आया है। अब पत्थरों के स्थान पर फल और फूलों का प्रयोग किया जाने लगा है, लेकिन युद्ध की यह विशिष्ट परंपरा आज भी देवीधुरा में जारी है।
देवीधुरा की बग्वाल यहां के लोगों की धार्मिक मान्यता का पवित्र रूप होने के साथ ही सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करने की विषय वस्तु भी है। एक वृद्धा के पौत्र का जीवन बचाने के लिए यहां की चारों खामों की विभिन्न जातियों के लोग आपस में किस प्रकार खून बहाते हैं।
यह सामाजिक सद्भाव के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों में से चार प्रमुख खाम चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बग्वाल का निमंत्रण देते हैं।
रणबांकुरों को करनी पड़ती हैं विशेष तैयारियां
माना जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि देने की परंपरा थी, लेकिन जब चम्याल खाम की वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि के लिए बारी आई तो वंशनाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की।
माता के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार ली। तभी से ही बग्वाल का सिलसिला चला आ रहा है।
बग्वाल में भाग लेने के लिए रणबांकुरों को विशेष तैयारियां करनी होती हैं, जिसमें एक पखवाड़े पूर्व से ही खान-पान संबंधी स्वच्छता बरतनी पड़ती है।
बग्वाल स्वच्छ कपड़े पहनकर लाठी और रिंगाल की बनी ढाल के फर्रे से खेली जाती है। सुरक्षा के लिए मैदान में फर्रो और लाठियों को सटाकर कवच बनाया जाता है। स्वयं को बचाकर दूसरे दल के फेंके गए पत्थर अथवा फल और फूल को दोबारा से दूसरी तरफ फेंकना ही बग्वाल कहलाता है।
आषाढ़ी कौतिक के नाम से भी मशहूर है बग्वाल
अतीत से ही आषाढ़ी कौतिक के नाम से मशहूर देवीधुरा की बग्वाल को देखने प्रतिवर्ष देश-विदेश के हजारों पर्यटक और श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचते हैं। मेला अवधि में क्षेत्र की लोक कलाओं के प्रदर्शन के अलावा धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी चरम पर रहता है।