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बनभूलपुरा हिंसा : 90 और 180 दिन के नियमों में उलझ गई नैनीताल पुलिस
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I- चार्जशीट में देरी के मामले में पुलिस मुख्यालय ने दिए जांच के आदेश
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I- जांच में पता चलेगा किसकी रही गलती और किस स्तर पर हुई लापरवाहीI
बनभूलपुरा हिंसा के आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के मामले में पुलिस 90 और 180 दिनों के नियमों के फेर में उलझ गई। जब तक पुलिस इस मामले को समझ पाती तब तक आरोपियों को डिफाल्ट जमानत मिल गई। इसमें पुलिस की लापरवाही रही या गलती इसका पता लगाने के लिए अब पुलिस मुख्यालय ने मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। इस संबंध में एडीजी कानून व्यवस्था ने डीआईजी कुमाऊं और एसएसपी नैनीताल को जांच करा जल्द से जल्द रिपोर्ट भेजने को कहा है। लापरवाही या गलती सामने आने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
दरअसल, हिंसा के आरोपियों पर पुलिस ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मुदकमे दर्ज किए थे। इसके साथ ही गैर कानूनी गतिविधि अधिनियम (यूएपीए) भी आरोपियों पर लगाया गया था। अब यहीं से दो नियम लागू हो जाते हैं। आईपीसी के तहत आरोपी जब जेल में बंद होता है तो उसके खिलाफ 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है। जबकि, यूएपीए में यह नियम 180 दिन का है। बताया जा रहा है कि पुलिस इसी गफलत में रही कि उनके पास 180 दिन का समय है। हालांकि, पुलिस ने निचली अदालत से चार्जशीट के लिए समय बढ़ाने की मांग की थी। मगर, कोर्ट में इसे प्राथमिक मुकदमों यानी आईपीसी के तहत दर्ज मामलों के हिसाब से ही चुनौती दी गई। यही कारण रहा कि आरोपियों को 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल न होने पर हाईकोर्ट ने आरोपियों को डिफाल्ट जमानत दे दी और निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।
हालांकि, रात दिन यही काम करने वाली पुलिस को यह मुगालता कैसे लगा इस बात की अब जांच की जानी है। इसके लिए एडीजी कानून व्यवस्था एपी अंशुमान ने डीआईजी कुमाऊं और एसएसपी नैनीताल को जांच कराने के निर्देश दिए हैं। ताकि, इस बात का पता लगाया जा सके कि इस मामले में लापरवाही रही या गलती। दोनों ही सूरतों में संबंधित के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
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Iयह है मामलाI
इसी साल आठ फरवरी को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में अवैध कब्जे हटाने पहुंची पुलिस पर स्थानीय लोगों ने हमला बोल दिया था। इसमें कई पुलिसकर्मी चोटिल हो गए थे। जबकि, जवाबी कार्रवाई और उपद्रव के दौरान दूसरे पक्ष के कुछ लोगों की मौत भी हुई थी। उपद्रवियों ने बनभूलपुरा थाना भी फूंक डाला था। जबकि, पुलिस और अन्य लोगों के दर्जनों वाहन भी फूंक डाले। इस मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी मुज्जमिल समेत सैकड़ों लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। इस मामले में अभी मुज्जमिल समेत 50 लोग जेल में बंद थे।
Iथाने को स्थापित करने में ही लग गया लंबा समयI
उपद्रवियों ने बनभूलपुरा थाने को भी आग लगा दी थी। इस मामले में जब पुलिस ने काम शुरू किया तो शुरुआती समय तो थाने को स्थापित करने में ही लग गया। इस समय के गुजरने के कारण भी विवेचना में देरी हुई। थाने का लगभग हर सामान जलकर राख हो गया था। बताया जा रहा है कि इस वजह से तकरीबन एक माह का समय पुलिस को ज्यादा लग गया।
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Iचार्जशीट में देरी में किस स्तर पर लापरवाही हुई। किसकी गलती रही। इन सबको जानने के लिए जांच के आदेश दिए गए हैं। डीआईजी कुमाऊं रेंज और नैनीताल एसएसपी को इस संबंध में निर्देशित किया गया है कि वे अपने पर्यवेक्षण में सभी तथ्यों की पड़ताल कर जल्द से जल्द पुलिस मुख्यालय को रिपोर्ट दें। -एपी अंशुमान, एडीजी कानून व्यवस्थाI
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I- चार्जशीट में देरी के मामले में पुलिस मुख्यालय ने दिए जांच के आदेश
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I- जांच में पता चलेगा किसकी रही गलती और किस स्तर पर हुई लापरवाहीI
बनभूलपुरा हिंसा के आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के मामले में पुलिस 90 और 180 दिनों के नियमों के फेर में उलझ गई। जब तक पुलिस इस मामले को समझ पाती तब तक आरोपियों को डिफाल्ट जमानत मिल गई। इसमें पुलिस की लापरवाही रही या गलती इसका पता लगाने के लिए अब पुलिस मुख्यालय ने मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। इस संबंध में एडीजी कानून व्यवस्था ने डीआईजी कुमाऊं और एसएसपी नैनीताल को जांच करा जल्द से जल्द रिपोर्ट भेजने को कहा है। लापरवाही या गलती सामने आने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
दरअसल, हिंसा के आरोपियों पर पुलिस ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मुदकमे दर्ज किए थे। इसके साथ ही गैर कानूनी गतिविधि अधिनियम (यूएपीए) भी आरोपियों पर लगाया गया था। अब यहीं से दो नियम लागू हो जाते हैं। आईपीसी के तहत आरोपी जब जेल में बंद होता है तो उसके खिलाफ 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है। जबकि, यूएपीए में यह नियम 180 दिन का है। बताया जा रहा है कि पुलिस इसी गफलत में रही कि उनके पास 180 दिन का समय है। हालांकि, पुलिस ने निचली अदालत से चार्जशीट के लिए समय बढ़ाने की मांग की थी। मगर, कोर्ट में इसे प्राथमिक मुकदमों यानी आईपीसी के तहत दर्ज मामलों के हिसाब से ही चुनौती दी गई। यही कारण रहा कि आरोपियों को 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल न होने पर हाईकोर्ट ने आरोपियों को डिफाल्ट जमानत दे दी और निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।
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हालांकि, रात दिन यही काम करने वाली पुलिस को यह मुगालता कैसे लगा इस बात की अब जांच की जानी है। इसके लिए एडीजी कानून व्यवस्था एपी अंशुमान ने डीआईजी कुमाऊं और एसएसपी नैनीताल को जांच कराने के निर्देश दिए हैं। ताकि, इस बात का पता लगाया जा सके कि इस मामले में लापरवाही रही या गलती। दोनों ही सूरतों में संबंधित के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
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Iयह है मामलाI
इसी साल आठ फरवरी को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में अवैध कब्जे हटाने पहुंची पुलिस पर स्थानीय लोगों ने हमला बोल दिया था। इसमें कई पुलिसकर्मी चोटिल हो गए थे। जबकि, जवाबी कार्रवाई और उपद्रव के दौरान दूसरे पक्ष के कुछ लोगों की मौत भी हुई थी। उपद्रवियों ने बनभूलपुरा थाना भी फूंक डाला था। जबकि, पुलिस और अन्य लोगों के दर्जनों वाहन भी फूंक डाले। इस मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी मुज्जमिल समेत सैकड़ों लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। इस मामले में अभी मुज्जमिल समेत 50 लोग जेल में बंद थे।
Iथाने को स्थापित करने में ही लग गया लंबा समयI
उपद्रवियों ने बनभूलपुरा थाने को भी आग लगा दी थी। इस मामले में जब पुलिस ने काम शुरू किया तो शुरुआती समय तो थाने को स्थापित करने में ही लग गया। इस समय के गुजरने के कारण भी विवेचना में देरी हुई। थाने का लगभग हर सामान जलकर राख हो गया था। बताया जा रहा है कि इस वजह से तकरीबन एक माह का समय पुलिस को ज्यादा लग गया।
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Iचार्जशीट में देरी में किस स्तर पर लापरवाही हुई। किसकी गलती रही। इन सबको जानने के लिए जांच के आदेश दिए गए हैं। डीआईजी कुमाऊं रेंज और नैनीताल एसएसपी को इस संबंध में निर्देशित किया गया है कि वे अपने पर्यवेक्षण में सभी तथ्यों की पड़ताल कर जल्द से जल्द पुलिस मुख्यालय को रिपोर्ट दें। -एपी अंशुमान, एडीजी कानून व्यवस्थाI