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पीढ़ियां बचाने में मानव से अधिक सतर्क पेड़-पौधे

Tue, 28 Feb 2017 09:42 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 28 Feb 2017 09:42 PM IST
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plant and trees more alert in Save Generations
पौधारोपण - फोटो : डेमो फोटो

अपनी पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए पेड़-पौधे मानव से अधिक सतर्क रहते हैं और चतुर भी हैं। बीमारियों और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचने में मानव एक बार धोखा खा सकता है, लेकिन पेड़-पौधे सही वक्त पर उचित निर्णय लेकर अपनी रासायनिक प्रक्रिया में फेरबदल कर सुरक्षा सुनिश्चित कर लेते हैं। यह स्थिति तब है, जब मानव की तरह पेड़-पौधों में न तो मस्तिष्क है और न नर्वस सिस्टम, सिर्फ एक पिगमेंट फाइटोक्रोम की मदद से वे अनुकूलन क्रिया में माहिर हैं।

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वनस्पति और वन विज्ञानियों को पेड़-पौधों की इस अनुकूलन क्षमता ने चौंका दिया है। वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के विज्ञानियों के अलावा अमेरिका और दूसरे देशों के शोधों में ऐसे ही नतीजे सामने आए हैं। पशुओं के चारे पर एफआरआई के एक शोध में पता चला कि जिन स्थानों पर भेड़-बकरी और दूसरे जानवर अधिक चरते हैं, वहां चारे (फॉडर) ने अपने रस को तीखा कर दिया है। जिन स्थानों पर जानवर नहीं चरते, वहां उसी प्रजाति के चारे का स्वाद अलग है। चारा प्रजाति ने अपनी सुरक्षा के लिए पत्तों में कड़ुवाहट बढ़ा दी है।
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इसी तरह पेड़-पौधे मौसम को भांप कर अपने बीजों के अंदर भ्रूण में भी बचाव का इंतजाम कर देते हैं। विज्ञानियों ने पाया कि जिस मौसम में अधिक बर्फबारी और बारिश का अंदेशा रहता है, उसमें भ्रूण के अंदर ऐसा सिस्टम बन जाता है कि वह बर्फ और पानी पाने के बाद ही परिपक्व होता है। एफआरआई के विज्ञानी डॉ. आरसी थपलियाल ने रेन सिंड्रोम पर 15 साल शोध किया है। जब बीमारियां पेड़ पौधों पर हमला बोलती हैं तो संक्रमित पौधे तुरंत अपने सेकेंडरी मेटाबोलिज्म में बदलाव कर लेते हैं। इसके साथ ही अपने बीजों में सुरक्षा तत्व बढ़ा देते हैं। शोधों में पाया गया कि अल्ट्रा वायलट किरणों के खिलाफ भी पेड़-पौधों ने अपना सिस्टम मजबूत कर लिया है।
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पेड़-पौधे खुद को और अपनी पीढ़ियों को बचाने के लिए अपने सेकेंडरी मेटाबोलिज्म को मजबूत कर लेते हैं। विज्ञानी पेड़-पौधों की चतुराई को अभी बहुत कम जान पाए हैं। देश-विदेश में शोध लगातार जारी हैं। ये फाइटोक्रोम नामक पिगमेंट से सेंस करते हैं। बीमारियों से बचने के लिए फिनोलिक कंपाउंड, टर्पिन आदि बढ़ा लेते हैं।
- डा. ओमवीर सिंह, वरिष्ठ विज्ञानी, वन अनुसंधान संस्थान

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