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इस बार नहीं मिलेगा सेब का ‘डिलिशियस’ टेस्ट
महेश कुमार / अमर उजाला, देहरादून (त्यूनी)
Updated Wed, 06 Jul 2016 11:05 AM IST
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अपने लाजवाब स्वाद के लिए खास पहचान रखने वाले रेड डिलिशियस और गोल्डन डिलिशियस प्रजाति के सेब के स्वाद से इस बार लोगों को महरूम होना पड़ सकता है।
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ऊंचाई वाले इलाकों में अपेक्षाकृत कम बर्फबारी और बारिश की वजह से सेब के इन प्रजातियों की पैदावार में रिकॉर्ड गिरावट आई है। कई इलाकों में तो इस बार इन प्रजातियों के पेड़ पर फूल तक नहीं खिले। विशेषज्ञ इसकी बड़ी वजह मौसम में आए बदलाव को मान रहे हैं।
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उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में रेड डिलिशियस व गोल्डन डिलिशियस प्रजाति के सेब की बंपर पैदावार होती है। बाजार में इसकी भारी डिमांड है। इन प्रजाति के सेब को पनपने के लिए 1400 से 1600 घंटे (करीब 56 दिन) तक दो से तीन डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है। लेकिन इस साल बर्फबारी न के बराबर होने से इस प्रजाति के सेब पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
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विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम में आए बदलाव के कारण इन प्रजातियों के सेब का उत्पादन काफी घट गया है। साथ ही सेब के साइज और स्वाद में भी परिवर्तन देखने को मिला है। अगस्त-सितंबर माह में फसल बाजार में आने लगती है। बागवान रमेश डोभाल, किशन सिंह, अरविंद पंवार का कहना है कि इस साल कम उत्पादन के चलते लोगों को लागत तक निकालना मुश्किल होगा।
जिले में यहां होता है उत्पादन
देहरादून जिले के जौनसार बावर क्षेत्र में कथियान, डांगूठा, हटाड़, भटाड़, छजाड़, बुन्हाड़, एंथाड़, ओबरासेर, फनार, भूट, पुरटाड़, रडू़, मुंधोल, डेरसा, प्यूनल, भाटगड़ी क्षेत्र में इन सेब की बंपर पैदावार होती है।
दोनों प्रजातियों से हो रहा मोह भंग
दो से तीन साल में जिस तरह सर्दियों में बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल रहा है, इसके चलते बागवानों का मोह इन प्रजातियों से भंग होने लगा है। वह ऐसी प्रजातियों को तरजीह देने लगे हैं जो अधिक तापमान में भी फल दे दें। इन प्रजातियों में अमेरिकन प्रजाति के स्केरलेट गाला, सुपर चीफ, ऑरगन स्पोर प्रमुख हैं। इन प्रजातियों के सेब को पनपने के लिए रेड डिलिशियस और गोल्डन डिलिशियस प्रजाति की अपेक्षा 800 से 1000 घंटे (करीब 33 दिन) तक ही कम तापमान की आवश्यकता होती है।
सेब की रेड डिलिशियस और गोल्डन डिलिशियस प्रजाति को पनपने के लिए कम तापमान की आवश्यकता होती है। इस साल कम बर्फबारी और ओलावृष्टि के चलते 70-80 प्रतिशत तक फसल प्रभावित हुई है।
- राजेश प्रसाद जसोला, उद्यान प्रभारी त्यूनी