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आपदाः ‘पीर के पर्वत’ से भी परायापन नहीं

Thu, 09 Jan 2014 12:17 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 09 Jan 2014 12:17 PM IST
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people are not ready to migrate Kedargati

आपदा से कराह रही केदारघाटी के लोग भले ही जिंदगी से जंग लड़ रहे हों, लेकिन जड़ों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

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पहाड़ छोड़ने को नहीं तैयार
गोंदार, चोमासी और भ्यूंदार जैसे गांव विस्थापन के लिए तो तैयार हैं पर पहाड़ छोड़ने के लिए नहीं। इन लोगों का साफ कहना है कि गांव जैसी हवा और पानी भला और कहां मिलेगा।

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जाहिर है कि गांव का अपनी मिट्टी से जुड़ा रहने का यह जज्बा उत्तराखंड सरकार के विस्थापन के सरल फॉर्मूले को धराशायी कर सकता है। आपदा के बाद नदी के कटाव के चलते केदारघाटी के दर्जनों गांव विस्थापन के लिए मजबूर हैं, लेकिन आजीविका के सवाल से जूझने के बावजूद ये गांव पहाड़ छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
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गोंदार के निवर्तमान प्रधान भगत सिंह पंवार के मुताबिक 60 के दशक में गांव में सिर्फ 35 परिवार थे। इस समय गांव में करीब 902 परिवार हैं। मदमहेश्वर घाटी में जिस जगह गोंदार इस समय बसा हुआ है, उससे करीब एक किलोमीटर दूर मूल गांव था।

कुछ मीटर दूर जाना भी मुश्किल
लोगों को खतरा महसूस हुआ तो दूसरी जगह पनाह ले ली। लेकिन अब उनके लिए गांव से कुछ मीटर दूर जाना भी मुश्किल हो रहा है। दरअसल 1982 में केदारनाथ संरक्षित क्षेत्र घोषित हो गया था और लोगों को गांव से बाहर एक निर्माण करने से पहले वन विभाग से मंजूरी लेनी होती है।


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पंवार के मुताबिक गांव के पास ही करीब 50 नाली जमीन है। यह जमीन मिल जाए तो सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। सवाल यह भी है कि अगर देहरादून में बस भी गए तो भला खाएंगे-कमाएंगे कैसे।

यही हाल चौमासी का भी है। चौमासी के प्रधान सुरेंद्र सिंह तिदौंरी का कहना है कि देहरादून, हरिद्वार में इतनी जमीन नहीं मिल पाएगी कि खुद रहने के साथ-साथ खेती और पशु पालन कर सकें। गांव के पास ही सुरक्षित जगह मिल जाए तो समस्या खत्म हो जाए।

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चौमासी भी अपने मूल गांव से करीब एक किलोमीटर अलग शिफ्ट हो चुका है। चौमासी के अधिकतर मकान अब निपतर में हैं, जो मूल गांव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है।

पूर्ण विस्थापित की सूची में शामिल जोशीमठ के पास के भ्यूंदार गांव की भी यही मांग है। यहां के लोगों का भी साफ कहना है कि भ्यूंदार को यहीं कहीं सुरक्षित जगह पर बसाया जाना चाहिए।

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