डाक्टरों की 'मांग' से आफत में मरीजों की जान
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उत्तराखंड प्रदेश में मरीजों की जान आफत में आ गई है। एक तरफ डाक्टर अपनी मांग मनवाने के लिए हर रोज दो घंटे कार्य बहिष्कार कर रहे हैं।
इस वजह से सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, अस्पतालों में जरूरी दवाओं का संकट पैदा हो गया है। अस्पताल में दवा नहीं मिलने के कारण लोगों को बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
इसके अलावा, सरकारी अस्पतालों में एक्सरे फिल्म का भी टोटा हो गया है। सोमवार को राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल समेत अन्य सरकारी अस्पतालों में सामान्य एक्सरे नहीं हो पाए। इससे मरीजों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ा।
सरकारी अस्पतालों में दवा का संकट गहराया
मुख्य चिकित्साधिकारियों के स्तर से नई औषधि क्रय नीति के अनुसार दवाओं की खरीद नहीं होने कारण सरकारी अस्पतालों में दवा का संकट बढ़ गया है। अस्पतालों में कई आवश्यक दवाओं की कमी हो गई है। स्वास्थ्य महानिदेशालय के स्तर से अस्पतालों को कुछ दवाएं भेजी गई हैं, लेकिन बढ़ती मांग के आगे वह नाकाफी साबित हो रही हैं।
नई औषधि क्रय नीति के तहत केंद्रीकृत व्यवस्था के तहत खरीद होनी है। इसके अनुसार स्वास्थ्य महानिदेशालय और मुख्य चिकित्साधिकारियों के स्तर से ही दवा, उपकरण, मशीनें और अन्य सामान खरीदे जाने हैं। हालांकि, दवा खरीद की शर्तें खासी जटिल होने के चलते निर्माता फर्म आपूर्ति में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है।
इसका खामियाजा अस्पतालों से दवा लेने वाले मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। ज्यादातर अस्पतालों में दवा की कमी बनी है। कई अस्पतालों में तो सामान्य खांसी-बुखार तक की दवाएं खत्म हो चुकी हैं। इस कारण मरीजों को बाजार से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
केवल तीन दिन की दवा
प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल दून में केवल तीन दिन की दवाओं का स्टॉक बचा है। अस्पताल में दवा सप्लाई करने वाली पब्लिक सेक्टर यूनिट की फर्म ने करार की 103 दवाओं के बजाय केवल 41 ही दवाओं की आपूर्ति की है।
खास बात यह है कि फर्म हर बार मांग करने पर केवल उन्हीं 41 दवाओं की आपूर्ति कर रही है, जबकि अन्य दवाओं की भारी कमी है। कई बार मांग भेजने के बावजूद दवाएं नहीं भेजी गई हैं। कंपनी की मनमानी के आगे विभाग लाचार है।
दवा, उपकरण व अन्य सर्जिकल सामान की खरीद एवं आपूर्ति के लिए मंगलवार को शासन स्तर पर वार्ता होगी। टेंडर नहीं होने के कारण दवा समेत अन्य सामान की किल्लत पैदा हो रही है। इसके समाधान का प्रयास किया जा रहा है।
- डा. कुसुम नरियाल, स्वास्थ्य महानिदेशक
अस्पतालों में अब एक्सरे भी नहीं
दवा की किल्लत से जूझ रहे प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में एक्सरे फिल्म का भी टोटा हो गया है। सोमवार को राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल समेत अन्य सरकारी अस्पतालों में सामान्य एक्सरे नहीं हो पाए। अस्पताल में एक्सरे नहीं होने पर लोगों को प्राइवेट में ज्यादा कीमत पर एक्सरे कराना पड़ा। वहीं, कई अन्य अस्पतालों में भी एक्सरे फिल्म का केवल कुछ दिन का ही कोटा शेष बचा है।
प्रदेश के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में पहले ही दवा का संकट बना हुआ है। अब एक्सरे शीट की किल्लत ने मरीजों की परेशानी बढ़ा दी है। सोमवार को सुबह राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मरीजों को इस आशय की जानकारी दी गई, जिसके बाद एपीएल के साथ ही बीपीएल वाले मरीज भी एक्सरे के लिए भटकते रहे।
लोगों ने मजबूरी में बाजार से महंगे दामों पर एक्सरे करवाए। अस्पताल में रोजाना करीब तीन सौ एक्सरे किए जाते हैं। इस संबंध में अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि विभागीय उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। अस्पताल के पीएमएस डा. आरएस असवाल ने कहा कि मेडिकोलीगल मामले में सामान्य एक्सरे किए जा रहे हैं। कमी वाली वस्तुओं की आपूर्ति के संबंध में कार्रवाई की जा रही है।
डॉक्टरों ने दो घंटे नहीं देखे मरीज
डायनेमिक एस्योर्ड कैरियर प्रोग्रेशन (डीएसीपी) की एक सूत्री मांग के संबंध में प्रदेश के चिकित्सकों ने सोमवार को दो घंटे का कार्य बहिष्कार किया। इस दौरान डॉक्टरों ने मरीज नहीं देखे। डॉक्टरों ने साफ किया जब तक उनकी मांग पूरी नहीं होगी तब तक हर रोज दो घंटे कार्य बहिष्कार किया जाएगा।
डीएसीपी की मांग पर प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ पिछले एक सप्ताह से आंदोलन कर रहा है। पहले चरण में सभी चिकित्सकों ने काली पट्टी बांधकर काम किया। एक सप्ताह बाद भी विरोध प्रदर्शन का असर ना पड़ने के बाद चिकित्सकों ने कार्य बहिष्कार शुरू किया है। सोमवार को प्रदेश के अलग-अलग स्थानों पर चिकित्सकों ने कार्य बहिष्कार कर विरोध जताया।
दून अस्पताल परिसर में एकत्रित होकर पीएमएचएस पदाधिकारियों व सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन किया। संघ के प्रदेश अध्यक्ष डा. संजीव गोस्वामी ने कहा कि वह एक सूत्री मांग के संबंध में लंबे समय से विरोध जता रहे हैं। सरकार नए चिकित्सकों को डीएसीपी का लाभ दे रही है, जबकि पुराने चिकित्सकों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए।
संघ महासचिव डा. नरेश नपलच्याल ने कहा कि एक ही संवर्ग में दो अलग-अलग तरह के प्रावधान चल रहे हैं। इसके विरोध में मजबूर होकर चिकित्सकों को दो घंटे के कार्य बहिष्कार का निर्णय लेना पड़ा है।
उन्होंने कहा कि कार्य बहिष्कार के दौरान इमरजेंसी के अलावा डॉक्टर अन्य मामले नहीं नहीं देखेंगे। इस अवसर पर संघ जिलाध्यक्ष डा. पवन शर्मा, महामंत्री डा. एसके झा, प्रांतीय पदाधिकारी डा. आनंद शुक्ला, डा. एनएस खत्री, डा. मेघना असवाल, डा. एसके सिंह, डा. अरूणा डबराल, डा. प्रवीण पंवार समेत अन्य सभी चिकित्सक मौजूद रहे।
परेशान रहे मरीज
चिकित्सकों के दो घंटे के कार्य बहिष्कार के कारण मरीज परेशान भटकते रहे। सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक चिकित्सकों ने कार्य बहिष्कार किया। सोमवार होने के चलते वैसे ही सुबह से मरीजों की भीड़ बढ़ने लगी। कार्य बहिष्कार के चलते मरीज डॉक्टरों के कक्ष के बाहर लाइन लगाकर खड़े रहे। इस दौरान मरीज एक से दूसरे डॉक्टर के कक्ष के चक्कर काटते रहे।
ब्रांडेड दवा लिखने वाले डाक्टर होंगे निलंबित
मरीजों के पर्चे पर जेनेरिक के बजाए ब्रांडेड दवा लिखने वाले सरकारी डाक्टरों को चिह्नित करने के लिए रेडक्रास सोसायटी की ओर से अभियान चलाया जाएगा। ब्रांडेड दवा लिखने वाले डाक्टरों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की जाएगी।
जेनेरिक दवाएं काफी सस्ती होती हैं, जबकि ब्रांडेड दवाओं के दाम इनसे कई गुणा अधिक होते हैं। अक्सर शिकायतें मिलती हैं कि डाक्टर जेनेरिक दवाओं के बजाए ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं और आम आदमी की जेब कटती है।
इस पर संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी रविनाथ रमन ने निर्देश दिए कि सरकारी डाक्टरों को रेडक्रास सोसायटी की ओर से संचालित जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध दवाएं ही लिखनी चाहिए। जिलाधिकारी ने रेडक्रास सोसायटी के पदाधिकारियों को निर्देश दिए कि व्यापक अभियान चलाकर ब्रांडेड दवा लिखने वाले चिकित्सकों को चिह्नित कर अवगत कराया जाए। ताकि ऐसे चिकित्सकों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की जा सके।