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चुनावी समर में सेनापतियों की ही किलेबंदी
अरुणेश पठानिया / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 29 Jan 2017 11:09 AM IST
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अजय भट्ट
- फोटो : file photo
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विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान का मोर्चा खुलने से पहले ही भाजपा और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की अपनी सीटों पर किलेबंदी कर दी गई है। यह किलेबंदी विरोधी दलों का रणनीतिक कौशल नहीं बल्कि ‘अपनों’ की बगावत है। जिस कैडर के बूते उन्हें अपनी और पार्टी की सियासी नैया पार लगानी थी, उसी कैडर को अपनी विधानसभाओं में संभालना चुनौती बन गया है।
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बागियों के नामांकन कराने से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और कांग्रेस प्रदेश किशोर उपाध्याय के सामने मुश्किल यह खड़ी हो गई है अपनी सीट संभाले की प्रदेश में प्रचार की कमान। हालांकि दोनों नेता बागियों नामांकन वापसी तक मना लेने का दावा कर चुके हैं।
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भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने रानीखेत से नामांकन दाखिल किया है। भट्ट के पास अध्यक्ष के अलावा पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष और चुनाव संचालन समिति की अहम जिम्मेदारी दी हुई है। भाजपा के बागी प्रत्याशी प्रमोद नैनवाल अपनी पत्नी सहित उनके खिलाफ नामांकन दाखिल करवा चुके हैं। रानीखेत की भिखियासैन बेल्ट में नैनवाल की लंबे समय से सियासी सक्रियता भट्ट की परेशानी बढ़ा रही है।
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साथ ही कांग्रेस प्रत्याशी कर्ण महारा के साथ उनका कांटे का मुकाबला है। वर्ष 2012 में महज 78 मतों से भट्ट जीते थे। ऐसे में उन्हें अपनी सीट बचाए रखने के लिए दोहरे मोर्चे से जूझना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में उनका अपना गढ़ छोड़कर दूसरे के लिए प्रचार करना मुश्किल की नजर आता है। शुक्रवार को भी वे देहरादून में बैठक के लिए पहुंचे और सुबह हेलीकॉप्टर से अपने क्षेत्र को रवाना हो गए।
उधर, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की स्थिति भी कमोबेश भट्ट की तरह ही है। टिहरी सीट से चुनाव की तैयारी कर रहे किशोर को पार्टी ने मैदान की सीट सहसपुर से उतार दिया। यहां उनका स्वागत बगावत से हुआ। उनके सीट से पार्टी कैडर ने प्रदेश कार्यालय में भारी तोड़फोड़ की। मामला तोड़फोड़ से हल नहीं हुआ तो पार्टी के पूर्व प्रत्याशी आर्येंद्र शर्मा ने शुक्रवार को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल कर पार्टी से खुली बगावत कर दी।
पहली बार मैदानी सीट पर उतरे किशोर के लिए सहसपुर से भाजपा विधायक सहदेव पुंडीर से अधिक बगावत को पार पाने की है। पुंडीर भी बगावत झेल रहे हैं, लेकिन किशोर के लिए बड़ी दिक्कत नई सीट के साथ पार्टी कैडर की टूट है। दोनों अध्यक्षों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि प्रदेश चुनाव संचालन का जिम्मा उनपर है। ऐसे में उससे संबंधित बैठकों के लिए राजधानी आना मजबूरी रहेगी, लेकिन प्रदेश में दूसरे प्रत्याशियों को लड़वाने के लिए उनके क्षेत्रों में प्रचार करना आसान नहीं रहने वाला है।
उक्रांद अध्यक्ष भी घिरे क्षेत्र में
भाजपा कांग्रेस के साथ प्रदेश के सबसे बड़े क्षेत्रीय दल उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष भी अपनी विधानसभा सीट द्वाराहाट तक सिमटते दिख रहे हैं। पुष्पेश को पार्टी की कमान मिलने के बाद जिस तरह संगठन को एकजुट करने में कामयाब रहे, उससे उनका कद बढ़ गया है। चुनाव संचालन का जिम्मा पुष्पेश पूर्व अध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार को सौंप चुके हैं, लेकिन खुद अपनी सीट पर कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों से मिल रही टक्कर उन्हें क्षेत्र में सीमित रहने को मजबूर करती दिख रही है। ऐसे में दूसरे प्रत्याशियों के क्षेत्र में जाकर उनके लिए प्रचार करना आसान नहीं रहेगा।
पार्टी के हर कार्यकर्ता को टिकट मांगने का अधिकार है, लेकिन जब पार्टी प्रत्याशी तय कर दे तो उसका एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए। बगावत परोक्ष रूप से सत्ताधारी दल के समर्थन माना जाएगा। अभी बगावत करने वालों को समझाया जा रहा है, लेकिन अगर नामांकन वापसी तक वे नहीं माने तो नियमों के तहत कार्रवाई करना मजबूरी होगी।
- अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा
टिकट नहीं मिलने से नाराज होना स्वभाविक है, लेकिन पार्टी असंतुष्टों को मना रही है। सहसपुर में कुछ को मना लिया है जबकि अन्य को भी मना लिया जाएगा। पार्टी आश्वस्त है कि नामांकन वापसी तक हम उठ रहे विरोध को शांत कर लेंगे। इससे चुनाव प्रभावित नहीं होगा।
- किशोर उपाध्याय, प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस