लोस में हार के बाद पंचायत चुनाव से घबराई कांग्रेस
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लोक सभा चुनाव में मिली करारी हार से घबराई कांग्रेस अब उत्तराखंड के पंचायतों में दावेदारी से बचने की कोशिश में भी है।
पंचायत चुनाव की अधिसूचना लागू होने के बाद भी पार्टी के पंचायत पर्यवेक्षक खामोश हैं। लोक सभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होने की संभावना को देखते हुए कांग्रेस ने इन पर्यवेक्षकों के नाम जारी किए थे।
पंचायत चुनाव को दलगत राजनीति से दूर रखने की बात कहकर अब कांग्रेस के नेता इस बात का संकेत भी दे रहे हैं। पंचायत चुनाव वैसे सिंबल पर नहीं लड़े जाते।
पर अब तक राजनीतिक दल जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुखों के पदों के लिए संगठन की ओर से नाम जारी करते रहें हैं। इन नामों के आधार पर ही यह तय भी हो जाया करता रहा है कि पंचायत में किसका दबदबा रहा।
अधिकतर स्थानों पर पंचायतों में भी भाजपा का दबदबा
फिलहाल अधिकतर स्थानों पर पंचायतों में भाजपा का दबदबा है। दूसरी ओर लोक सभा चुनाव से पहले तक कांग्रेस पंचायत में क्लीन स्वीप करने का दावा करने से भी परहेज नहीं कर रही थी।
मार्च 2014 में पंचायत चुनाव की संभावना बनी तो कांग्रेस ने बाकायदा पर्यवेक्षकों की सूची भी जारी की थी। बाद में लोक सभा चुनाव पर फोकस करने का तर्क देकर चुनाव टालने पर ज्यादा जोर दिया गया।
इस मंसूबे में कांग्रेस सफल भी रही थी। पर अब लोक सभा चुनाव में नजारा बदलने के बाद से कांग्रेस और बड़ी मुसीबत से घिरा हुआ खुद को पा रही है।
सत्तापक्ष को जवाब देना और मुश्किल
स्थानीय स्तर पर हो रहे इन चुनावों में हार से सत्तापक्ष को जवाब देना और मुश्किल हो सकता है। ऐसे में पंचायत चुनाव को दलगत राजनीति से दूर रखने की पैरवी की जा रही है।
कांग्रेस पार्टी सूत्रों के मुताबिक इसके लिए ब्लॉक प्रमुख स्तर तक पर संगठन की ओर से प्रत्याशियों की सूची जारी करने से बचा जा सकता है।
दूसरी ओर जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर पूरी तरह से फोकस करते हुए अधिकतम अध्यक्ष निर्वाचित कराने पर जोर देने की योजना बनाई जा रही है।
जिला पंचायतों में आरक्षण में कोई बदलाव नहीं
पंचायत के चुनाव की अधिसूचना हो जाने के बाद आरक्षण को लेकर भी सवाल उठ खड़ा हुआ है। परिसीमन के बाद भी आरक्षण की स्थिति में खास बदलाव नहीं आया है।
जिला पंचायत अध्यक्ष पद और ब्लॉक प्रमुख पद पर आरक्षण में कोई बदलाव नहीं हुआ है। फरवरी 2013 में जारी किया गया आरक्षण जिलों और ब्लॉक प्रमुखों के लिए पूर्ववत ही रखा गया।
सचिव पंचायत विनोद फोनिया ने इसकी पुष्टि की। पूर्ववर्ती व्यवस्था के तहत उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग महिला, चमोली महिला एससी, नैनीताल एससी, अल्मोड़ा महिला तथा शेष जिलों का सामान्य घोषित किया गया था।
गड़बड़ा गया परिसीमन
देहरादून सामान्य थी। देहरादून के सामान्य रहने से अब पंचायत मंत्री प्रीतम सिंह के भाई चमन सिंह के पंचायत चुनाव में उतरने का रास्ता भी साफ हो गया है। चमन सिंह ने देहरादून से जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी की थी।
पंचायत चुनाव कायदे में 29 सितंबर 2013 में हो जाने चाहिए थे। पर इसमें परिसीमन का पेच भी फं सा था। परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया जबकि इसे 2011 की जनगणना के आधार पर होना चाहिए था।
इस कमी को बाद में दूर कर लिया गया पर इस बीच सरकार ने कुछ नई नगर पालिकाओं का गठन कर दिया। इससे बेरीनाग और नरेंद्र नगर में परिसीमन गड़बड़ा गया।
अब यह शिकायत है कि इन ब्लॉकों में परिसीमन के आधार पर वार्डों का गठन सही नहीं किया गया। इससे इन ब्लॉकों में आरक्षण की स्थिति भी बदल गई है।
सूत्रों के मुताबिक पंचायत चुनाव टालने के लिए एक आधार यह भी बनाया गया था। पर चुनाव समय से कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखते हुए इरादा बदल दिया गया।