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चला भुलों अपणा पहाड़ जौला...

Mon, 22 Jul 2019 01:54 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jul 2019 01:54 AM IST
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Painted mountain pain in poet conference
देहरादून। साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था धाद की ओर से रविवार को रेसकोर्स स्थित ऑफिसर्स ट्रांजिट हॉस्टल में हरेला के उपलक्ष्य में गढ़वाली कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस दौरान राज्य के नामचीन कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से पहाड़ का दर्द बयां किया। कुछ कवियों ने हास्य रचनाओं से श्रोताओं को गुदगुदाया। इस मौके पर शिवदयाल शैलज के काव्य संग्रह ‘छोया नि सूखा’ का लोकार्पण भी किया गया।
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वरिष्ठ साहित्यकार तोताराम ढौंढियाल की अध्यक्षता में कवि सम्मेलन का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। उन्होंने हरेला और लोकभाषा के महत्व की जानकारी दी। इसके बाद कवि हरीश कंडवाल ने ‘चला दगड्यों हरेला मनोला, डाली लगे औला, डाली लगे औला... से पेड़ों का महत्व समझाया। शांति बिंजोला ने माया की पठली मा खैरयूं की... से श्रोताओं को पहाड़ की पीड़ा बयां की। चंद्रदत्त सुयाल ने चला भुलों अपणा पहाड़ जौला... झुमैलो सुनाकर लोगों से अपनी मिट्टी से जुड़ने का आह्वान किया। अरुण थपलियाल ने ‘ऋषिकेश बटिन चलली कर्णप्रयाग, क्या चलली, कन चलली... से पहाड़ में यातायात की दुर्दशा बयां की। इसके अलावा कवि शांति प्रकाश जिज्ञासू, सुरेश, लक्ष्मण सिंह रावत, चंद्रदत्त सुयाल, सुरेश स्नेही, बीना बेंजवाल, अभिषेक, गोपाल बिष्ट, मधुर वादिनी, दिनेश डबराल, शिवदयाल शैलज, बलबीर राणा ‘अडिग’ ने भी अपनी रचनाएं पढ़ीं। मुख्य अतिथि लोकेश नवानी ने कहा कि धाद ने इस वर्ष हरेला पर्व को उन लोक कलाकारों को समर्पित किया है, जिन्होंने पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को बचाने और फैलाने का काम किया। साहित्यकार सुमित्रा जुगलान ने कहा कि पहाड़ की समृद्धशाली विरासत को बचाने के लिए जरूरी है कि बच्चों को अपनी बोली-भाषा के कार्यक्रमों से जोड़ा जाए। कवि सम्मेलन में धाद लोकभाषा एकांश की अध्यक्ष बीना कंडारी, सचिव प्रेमलता सजवाण, तन्मय ममगाईं, रमाकांत बेंजवाल, डीसी नौटियाल, बृजमोहन उनियाल, कुलदीप कंडारी, तन्वी पाल, विजय जुयाल आदि मौजूद रहे।
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