ऑपरेशन सिलक्यारा की कामयाबी: बदलते उत्तराखंड का संदेश और सबक, अनहोनी होती तो खड़ा हो जाता चुनौतियों का पहाड़
सिलक्यारा ऑपरेशन की कामयाबी ने भविष्य की टनल परियोजनाओं को भी अंधेरे से निकाला है। अगर कोई अनहोनी होती तो सड़क से अदालत तक चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो जाता।
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दिल्ली से दून और दून से सीमांत जिले उत्तरकाशी के सिलक्यारा तक टनल में फंसे 41 मजदूरों के सुरक्षित बाहर निकलने की दुआएं कबूल हुईं। ऑपरेशन सिलक्यारा के तहत जब आखिरी मजदूर ने टनल से बाहर आकर खुली हवा में सांस ली तो देश और दुनिया में बदलते उत्तराखंड का संदेश भी गया।
मजदूरों के टनल में फंसने के बाद पैने और धारदार सवालों की कोई कम बौछार नहीं हो रही थी। कोई अनहोनी होती तो केंद्र और राज्य सरकार के सामने सड़क से अदालत तक न जाने की कितनी ही चुनौतियां खड़ी हो सकती थीं। शायद अब इसके आसार कम होंगे, लेकिन यह सच्चाई है कि यह पूरा घटनाक्रम प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील उत्तराखंड को कई सबक सिखा गया।
इस हादसे के बाद उत्तराखंड ही नहीं, देशभर में सुरंग निर्माण के नीति-नियोजन को सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल अलग ढंग से देखा जाना तय है। खुद केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि देशभर में पौने तीन लाख करोड़ की राशि सुरंगों के निर्माण पर खर्च होनी है।
टनल परियोजनाओं के खिलाफ दबी आवाजें तेजी से उठतीं
जाहिर तौर पर इनमें से कुछ प्रस्ताव उत्तराखंड के भी हैं और अब सुरंगों इन सभी योजनाओं पर सुरक्षा के लिहाज से नए नजरिये के साथ सोचना होगा। जानकारों का मानना है कि ऑपरेशन सिलक्यारा की सफलता से राज्य में प्रस्तावित टनल परियोजनाओं पर छाया कुहासा भी छंट गया। यदि कोई हादसा हो जाता तो प्रस्तावित टनल परियोजनाओं के खिलाफ दबी आवाजें तेजी से उठतीं।
उत्तराखंड में यातायात को सुगम बनाने के लिए कई टनल बनाई जानी है। यह प्रयोग लंबे समय से यहां हो रहा है। रुद्रप्रयाग में केदारनाथ मार्ग पर और डाटकाली के पास की टनल पुराने उदाहरण हैं। राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों में रेल और सड़क कनेक्टिविटी के लिए प्रस्तावित परियोजनाओं में कई सुरंगों का प्रावधान किया गया है। मसूरी में और दून से टिहरी के बीच टनल बनाने की योजनाओं पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। इस ऑपरेशन ने भविष्य की इन सभी योजनाओं को अंधेरे से निकाला है।
सुरक्षित उत्तराखंड का संदेश गया
2013 की आपदा से उबरने और सुरक्षित देवभूमि का विश्वास जगाने के बाद उत्तराखंड को देश का अग्रणी राज्य बनाने की योजना पर सरकार आगे बढ़ रही है। उत्तराखंड का दशक बनाने का पीएम मोदी के सपने को साकार करने के लिए सीएम धामी देश और दुनिया के निवेशकों को उत्तराखंड लाने के प्रयास कर रहे हैं। वैश्विक निवेशक सम्मेलन से पूर्व अधिक से अधिक निवेशकों को आकर्षित करने के ये प्रयास सिलक्यारा हादसे से ठिठक गए, मगर जानकार मान रहे हैं कि ऑपरेशन की कामयाबी ने उत्तराखंड के प्रति विश्वास जगाने का भी काम किया है।
पुख्ता तैयारी करने का सबक सिखाया
पहले जोशीमठ फिर मानसून का कहर और उसके बाद सिलक्यारा। हिमालय की नाजुक पहाड़ में बसे उत्तराखंड में आपदाओं का यह सिलसिला शायद ही कभी रुकेगा। सिलक्यारा हादसा आपदाओं के लिए संवेदनशील उत्तराखंड राज्य को सबक भी सिखा गया कि वह आपदा में केंद्रीय एजेंसियों का बार-बार मुंह नहीं ताक सकता। उसको खुद अपने बूते पर पुख्ता तैयारियां करनी होंगी। ऑपरेशन की कामयाबी के लिए उत्तराखंड सरकार ने बेशक सहयोगी की भूमिका में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जानकारों का मानना है कि सरकार को इससे अधिक तैयारी करनी होगी। आपदाएं हर बार सिलक्यारा हादसे जैसा समय नहीं देंगी, इसलिए आपदा प्रबंधन से जुड़े उपकरणों, दक्ष मानव संसाधनों, तकनीकी विशेषज्ञों को तैयार करने के लिए खुद के बूते तैयारी करनी होगी।
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इसे मैं कंस्ट्रक्शन फेल्योर मानता हूं। जब कोई टनल बनती है, तो उससे फासला तो कम होता है, साथ ही जंगल को भी कम हानि होती है। सड़क बनाने की तुलना में टनल ज्यादा सुरक्षित विकल्प है। इस घटना से हमें सबक लेना होगा कि आपदा प्रबंधन के लिए समर्पित तंत्र और संसाधन जुटें। उपकरणों, भूगर्भीय और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ प्रशिक्षित मानव श्रम होना चाहिए। -डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, पद्मभूषण, हैस्को प्रमुख
सिलक्यारा हादसे के बाद सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश में सुरंगों के निर्माण को लेकर सजगता और सतर्कता की जरूरत होगी। इसके निर्माण में सुरक्षा से जुड़े पहलुओं में निसंदेह कुछ सुधार दिख सकता, लेकिन सवाल सुपर सेंसिटिव हिमालय क्षेत्र में बड़े निर्माण का है। इस पर विचार करना जरूरी है। इस घटना ने यह भी बता दिया कि जिस मानसिकता के साथ हमारा सरकारी तंत्र काम करता है, उससे काम नहीं चलेगा। -अनूप नौटियाल, सामाजिक कार्यकर्ता