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आपदा से पस्त पिंडरघाटी के नहीं बदले हालात

Mon, 16 Jun 2014 12:43 PM IST
विनय बहुगुणा/ अमर उजाला, कर्णप्रयाग
विनय बहुगुणा/ अमर उजाला, कर्णप्रयाग Updated Mon, 16 Jun 2014 12:43 PM IST
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one year of uttarakhand disaster

आपदा को एक वर्ष होने को है। लेकिन प्रभावित क्षेत्रों में हालात अब भी सुधर नहीं पाए हैं। सड़कों से लेकर पैदल रास्तों की स्थिति जहां हादसों का सबब बनी हुई है।

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बाढ़ सुरक्षा के कार्य टेंडर प्रक्रिया तक सिमटे
आपदा का दंश झेल रहे गांवों की सुध नहीं ली गई है। बाढ़ सुरक्षा के कार्य टेंडर प्रक्रिया तक सिमटे हुए हैं। जबकि मुआवजे के लिए अब भी कई लोग तहसील का चक्कर काट रहे हैं।
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बीते वर्ष 16 से 18 जून को जलप्रलय (आपदा) ने पिंडरघाटी को सबसे अधिक प्रभावित किया। नारायणबगड़ का पुराना बाजार जहां पिंडर नदी में बह गया था। वहीं थराली का नासीर बाजार, मस्जिद मार्केट का अधिकांश हिस्सा तबाह हो गया था।
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यहां करीब पांच सौ आवासीय मकान और दुकानों को पिंडर नदी लील गई थी। बमुश्किल लोग अपनी जान बचा पाए थे।

शरणार्थियों की तरह जीआईसी व जीजीआईसी नारायणबगड़, प्राथमिक विद्यालय अपर बाजार थराली, ब्लाक सभागार में कई परिवार शरण लिए हुए थे। लेकिन अब भी हालात में सुधार नहीं हो सका है।

मलबे के ढेर जस के तस खतरे का सबब बने हुए हैं। कर्णप्रयाग-ग्वालदम मोटर मार्ग से लेकर अन्य संपर्क मार्गो की स्थिति भी बदहाल बनी हुई है। सरकारी सिस्टम मरम्मत व सुधारीकरण के दावे कर रहा है। लेकिन हकीकत अब भी रूह कंपाने जैसी है।

प्रभावित गांवों की नहीं ली गई सुध
आपदा के एक वर्ष बाद भी पिंडरघाटी के केवर, भ्याड़ी, छपाली, त्यूंला, हरमनी, कुलसारी, बेडगांव, देवराड़ा, चिडिंगा सहित कर्णप्रयाग ब्लाक के सुनाली, कंडारी, हिंडोली आदि गांवों की सुध नहीं ली गई है।

आपदा के कहर ने यहां आवासीय मकानों सहित गौशाला व रास्तों को निस्तनाबूत कर दिया था। लेकिन आज तक सरकारी स्तर पर मरम्मत के प्रयास नहीं हुए हैं। जो थोड़ा बहुत काम हुए भी हैं, वे ग्रामीणों ने स्वयं अपने प्रयासों से किए हैं।

तहसील थराली में 12 गांवों को विस्थापन की सूची में शामिल किया गया है। लेकिन आज तक एक का भी भू-गर्भीय सर्वेक्षण नहीं हो पाया है। ग्रामीण टूटे घरों में ही दशहत के साए में जी रहे हैं।

नहीं मिला मुआवजा

नारायणबगड़ और थराली ब्लाक के कई आपदा प्रभावित व्यवसासियों को अभी तक मुआवजा नहीं मिल पाया है।

प्रभावित दलवीर सिंह, नरेंद्र, संजय आदि का कहना है कि एक वर्ष में न जाने कितने चक्कर तहसील के लगा दिए हैं। लेकिन मुआवजा तो दूर, आश्वासन तक भी नहीं मिल पाया।

बाढ़ सुरक्षा के कार्य टेंडर तक सिमटे
नारायणबगड़ और थराली में पिंडर नदी के कहर से बस्ती क्षेत्र को बचाने के लिए बाढ़ सुरक्षा के कार्य एक वर्ष बाद भी टेंडर प्रक्रिया से आगे नहीं बढ़ पाए हैं।

जबकि यहां अभी तक नदी का पानी बढ़ने लगा है, जिससे लोगों में भय बना है। स्थिति यह है कि सीएम के आश्वासन पर भी इन क्षेत्रों का विशेषज्ञों के द्वारा भू-गर्भीय सर्वेक्षण भी नहीं किया गया है।


सड़क अब भी बदहाल
पिंडरघाटी की लाइफ लाइन कहे जाने वाली कर्णप्रयाग-ग्वालमद सड़क की स्थिति भी आपदा के बाद से नहीं सुधर पाई है। कई स्थानों पर जहां मलबे के ढेर लगे हैं।

वहीं भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में हल्की बरसात भी कहर ढा सकती है। बीआरओ मरम्मत की बात तो कर रहा है। लेकिन स्थायी ट्रीटमेंट के लिए शासन से धन नहीं मिलने की बात भी कह रहा है।

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