केदारनाथ: चमत्कारी शिला ने मंदिर को बचाया
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आपदा में केदारघाटी में केदारनाथ मंदिर आश्चर्यजनक रूप से बच गया था। कहा जाता है कि एक चमत्कारिक शिला मंदिर के ठीक पीछे आकर अड़ गई थी इससे मंदिर को बहुत कम नुकसान पहुंचा था।
बाकी आसपास के सारे भवन तबाह हो गए थे। स्थिति जस की तस है। मंदिर की ऊपरी तौर पर सफाई कर ली गई है। परिसर का मलबा हटा दिया गया है।
पांच मई को कपाट खुलने के बाद साहसी यात्रियों ने बाबा केदार के दर्शन भी किए हैं। लेकिन कहना होगा आपदा के एक साल भर बाद भी केदारनाथ यात्रा पटरी पर नहीं लौटी है।
हालांकि इस एक साल में सड़क मार्ग कामचलाऊ ढंग से दुरुस्त किया गया है, जबकि गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग का पुनर्निर्माण सुस्त गति से हो रहा है।
बस घिसट रही है केदारनाथ यात्रा
केदारनाथ यात्रा आपदा शासन-प्रशासन की निगरानी में हो रही है। वर्तमान में भी शासन-प्रशासन द्वारा ही केदारनाथ यात्रा का संचालन किया जा रहा है।
गत वर्ष आपदा से सबक लेकर इस बार धाम को जाने वाले तीर्थ यात्रियों का बायोमैट्रिक्स रजिस्ट्रेशन किया जा रहा है।
आपदा के कारण केदारनाथ धाम में क्षतिग्रस्त निजी व सरकारी परिसंपत्तियों का अभी तक पुनर्निर्माण नहीं हो पाया है। सरकार ने तीर्थ यात्रियों को निशुल्क रहने के लिए प्री फ्रेबिकेटेड हट्स व टेंट लगाए हैं।
इसके अलावा भोजन की व्यवस्था भी निशुल्क की गई है। गत वर्ष केदारनाथ त्रासदी से क्षतिग्रस्त भवनों की स्थितियां धाम में जस की तस है।
हालांकि केदारनाथ मंदिर के पीछे मंदाकिनी नदी का डायवर्जन कार्य लगभग 11 माह बाद शुरू कर दिया गया है। इसके अलावा केदारनाथ मंदिर के सुंदरीकरण कार्य भी एएसआई द्वारा संचालित किया जा रहा है।
आपदा के कारण क्षतिग्रस्त गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग का पुनर्निर्माण कर दिया गया है। कुछ स्थानों पर रास्ता खतरनाक बना हुआ है, जिसका सुधारीकरण किया जा रहा है।
जेहन में आज भी जिंदा है तबाही का मंजर
जून 2013 की आपदा को एक साल हो गया है। एक साल बाद भी व्यवस्थाएं पटरी पर नहीं आई, यही वजह है कि आपदा की तबाही का मंजर हर किसी के जेहन में आज भी जिंदा है।
यादों में एक साल पीछे लौटें तो उत्तरकाशी में 12 जून से ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी। 12 से 14 जून के बीच गंगोत्री हाईवे एक के बाद एक सैंज, चिन्यालीसौड़, धरासू नालूपाणी में अवरुद्ध हुआ।
15 जून की रात को असी गंगा एवं भागीरथी में आए उफान के साथ तबाही का सिलसिला शुरू हो गया। गंगोरी से लेकर उत्तरकाशी तक बाढ़ सुरक्षा कार्य में लगी मशीनें बाढ़ की भेंट चढ़ीं।
गंगोत्री हाईवे जगह-जगह अवरुद्ध हो गया था। सूचना नहीं मिलने पर 16 जून की तड़के यात्रा पड़ावों से वाहन आगे बढ़े और जगह-जगह फंसकर रह गए।
बाढ़ ने बरपाया कहर
16 जून की सुबह बाढ़ ने उजेली, तिलोथ बस्ती पर कहर बरपाना शुरू किया।
संस्कृत महाविद्यालय का छात्रावास, तिलोथ पुल की एप्रोच रोड, कैलाश आश्रम के दो शिव मंदिर का बड़ा हिस्सा, तिलोथ बस्ती के आधा दर्जन भवन और गंगोरी-गरमपानी के बीच हाईवे का 50 मीटर हिस्सा तबाह हो गया था।
16 जून की रात को भी मूसलाधार बारिश और जलागम क्षेत्रों में बादल फटने से भागीरथी एवं इसकी सहायक नदियों में उफान आया।
रात दो बजे बाढ़ के हालात पैदा हुए और धराली से डुंडा तक तटवर्ती हिस्सों में शुरू हुआ। तबाही का सिलसिला 17 जून की शाम को ही थमा था।
सरकार ने किसी तरह शुरु करवाई चारधाम यात्रा
आपदा को गुजरे एक साल बीतने के बाद भी हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।
आपदा में तबाह यमुनोत्री-गंगोत्री हाईवे कामचलाऊ तैयार कर सरकार ने किसी तरह चारधाम यात्रा चालू तो करा दी, लेकिन तीर्थयात्रियों की कम आमद के चलते स्थानीय लोगों को इससे कुछ फायदा नहीं मिला।
आपदा में तबाह होने के बाद जुगाड़ पर शुरू की गई पेयजल योजनाएं अब दम तोड़ने लगी हैं। बाढ़ में बहे डेढ़ दर्जन पुलों में से एक भी नहीं बन पाए हैं। सिर्फ डिगिला एवं तिलोथ में अस्थायी तौर पर 1-1 बैली ब्रिज जरूर तैयार हुआ है।
बाढ़ में आए भारी मलबे से ऊंचे हुए रीवर बेड को अभी तक सामान्य नहीं किया जा सका है, जिससे नदी में पानी बढ़ने पर तटवर्ती हिस्सों में कटाव का खतरा बरकरार है।
तटवर्ती आबादी की सुरक्षा के लिए 1.71 करोड़ खर्च किया गया। नदी का चैनलाइजेशन थोड़ा पानी बढ़ते ही फेल हो चुका है।
बाढ़ सुरक्षा के लिए सरकार ने 400 करोड़ की वृहद योजना स्वीकृत तो की, लेकिन बजट की कमी, धीमी रफ्तार और मानकों को ताक पर रखकर हो रहे निम्न गुणवत्ता के कार्यों के चलते आधे-अधूरे कार्य आपदा प्रभावितों में सुरक्षित होने का भरोसा पैदा नहीं कर पाए हैं।