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भीमल से अब महज से दो घंटे में निकाला जा सकेगा रेशा
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राज्य के पर्वतीय इलाकों में बहुतायत में पाए जाने वाले भीमल से रेशा महज दो घंटे में निकल आएगा। इसके लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम ने एक मशीन इजाद की है। मालूम हो कि भीमल से रेशा निकालकर उससे ग्रामीण चटाई, बैग और पर्स जैसे उत्पाद बनाते हैं। इसकी बिक्री से ग्रामीण अपनी आजीविका को भी सुधार सकते हैं। अभी तक ग्रामीणों को परंपरागत तरीके से भीमल से रेसे निकालने में एक महीने का समय लगता है।
वन अनुसंधान संस्थान के विस्तार प्रभाग की ओर से वन विज्ञान केंद्र में आयोजित एक कार्यक्रम में भीमल से रेशा निकालने की तकनीक के बारे में लोगों को रूबरू कराया गया। इस दौरान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. चरण सिंह ने भीमल पर आधारित कृषिवानिकी पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भीमल को रेशा बनाने की मशीन ईजाद किए जाने के बाद अब ग्रामीण मात्र दो घंटे मे रेशा बना सकेंगे।
कार्यक्रम में संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेंद्र कुमार ने कहा कि राज्य के मैदानी और पर्वतीय इलाकों में बहुउपयोगी पेड़-पौधे बहुतायत में पाए जाते हैं। इसमें भीमल भी शामिल है। भीमल पौधे से पशुओं के लिए चारा और रेशा मिलता है लेकिन उसे निकालने के लिए ग्रामीणों को काफी जद्दोजहद के साथ एक माह का इंतजार भी करना होता है। अब भाप आधारित मशीन की सहायता से रेशा निकालने की प्रक्रिया महज दो घंटे में पूरी हो जाएगी।
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वन अनुसंधान संस्थान के विस्तार प्रभाग की ओर से वन विज्ञान केंद्र में आयोजित एक कार्यक्रम में भीमल से रेशा निकालने की तकनीक के बारे में लोगों को रूबरू कराया गया। इस दौरान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. चरण सिंह ने भीमल पर आधारित कृषिवानिकी पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भीमल को रेशा बनाने की मशीन ईजाद किए जाने के बाद अब ग्रामीण मात्र दो घंटे मे रेशा बना सकेंगे।
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कार्यक्रम में संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेंद्र कुमार ने कहा कि राज्य के मैदानी और पर्वतीय इलाकों में बहुउपयोगी पेड़-पौधे बहुतायत में पाए जाते हैं। इसमें भीमल भी शामिल है। भीमल पौधे से पशुओं के लिए चारा और रेशा मिलता है लेकिन उसे निकालने के लिए ग्रामीणों को काफी जद्दोजहद के साथ एक माह का इंतजार भी करना होता है। अब भाप आधारित मशीन की सहायता से रेशा निकालने की प्रक्रिया महज दो घंटे में पूरी हो जाएगी।
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