अब दलित विधायक हुए उत्तराखंड CM हरीश रावत के खिलाफ
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राज्यसभा सदस्य के नाम पर हुए विरोध से निपटे उत्तराखंड मुख्यमंत्री से अब उन्हीं के दल के दलित विधायक नाखुश हो गए हैं।
अपने विधानसभा क्षेत्रों की अनदेखी का आरोप लगाकर इन विधायकों ने एक बैठक की, जिसमें हरीश रावत पर तमाम आरोप लगाए। यह खबर सीएम तक पहुंची तो उन्होंने एक-एक करके सबसे अलग-अलग मुलाकात की। करीब दो घंटे तक चले मान-मनौव्वल के बाद भी विधायकों की नाराजगी खत्म होती नहीं दिख रही है।
दर्जा मिलने से असंतुष्ट दलित विधायक मंत्रिमंडल विस्तार में अपने लिए एक पद पक्का करना चाहते हैं। अपने दावे को मजबूत करने के लिए जुटे विधायक पार्टी के दूसरे दलित विधायकों के संपर्क में भी हैं।
कांग्रेस में हुई विधायकों की बगावत के बाद से उत्तराखंड की राजनीति में छोटी-छोटी बात पर बिफरने की अदा ज्यादातर विधायकों में शुमार हो गई है। सरकार का सहारा बनी पीडीएफ विधायक दिनेश धनै तो कभी कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं तो कभी विधायक हरिदास मंत्री पद न दिए जाने को लेकर सरकार की मुखालफत करते नजर आते रहे हैं।
कांग्रेस में चल रहा रूठने-मनाने का सिलसिला
रूठने-मनाने के इस क्रम में ताजा प्रकरण कांग्रेस के दलित विधायकों से जुड़ा है, जो मुख्यमंत्री हरीश रावत पर अपने क्षेत्रों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए मुखर हो गए। सूत्रों की मानें तो यशपाल आर्य की अगुवाई में इनकी एक बैठक भी हुई, जिसमें विधायक जीतराम और ममता राकेश के अलावा कुछ अन्य विधायक भी शामिल हुए।
इन लोगों ने विकास कार्यों के अलावा क्षेत्र से संबंधित तमाम मांगों पर मुख्यमंत्री की ओर से कोई फैसला न लिए जाने की बात कही। इधर यह जानकारी मुख्यमंत्री के नजदीकियों को मिली तो उन्होंने शाम को ही सभी को बीजापुर गेस्ट हाउस में बुलाया।
शाम छह बजे इन लोगों से मुख्यमंत्री ने एक-एक करके बातचीत की और उनकी मांगों के बारे में पूछा। सूत्रों की मानें तो विधायक जीतराम ने चमौली जिले की तहसील और अपने विधानसभा क्षेत्र थराली को जिला घोषित करने समेत विकास कार्यों की लंबी सूची पढ़कर सुनाई।
वहीं विधायक ममता राकेश के साथ भी विकास कार्यों से जुड़े मुद्दों के अलावा भगवानपुर विधानसभा में स्थित मेडिकल कॉलेज का नाम उनके स्वर्गवासी पति सुरेंद्र राकेश के नाम रखने की मांग को प्रमुखता से सीएम के सामने रखा। मुख्यमंत्री ने ज्यादातर मांगों को जल्द से जल्द पूरा करने का आश्वासन तो दिया, मगर सूत्रों की मानें तो बात बनती नजर नहीं आ रही है।
ब्लैकमेलिंग के तीर से सटीक निशाना
उत्तराखंड की सियासत में ब्लैकमेलिंग अपनी चाहत को पूरा करने का नया फॉर्मूला बन गया है। बीते एक साल में इस ट्रिक को अपनाकर किसी ने लाल बत्ती झटक ली तो किसी ने मलाईदार विभाग। यहां तक कि अफसरों की पोस्टिंग करवाने तक के लिए इस दांव को यहां के सियासी अखाड़े में खूब आजमाया गया।
मुख्यमंत्री हरीश रावत खुद अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में इस तरह की सियासत को बल देते रहे। करीब साल भर पहले का वह वाकया अभी तक ज्यादातर लोगों के जहन में है, जब कांग्रेस विधायक कुंवर प्रणव सिंह ‘चैंपियन’ ने हरीश रावत के खिलाफ मोर्चा खोला था। तमाम मुद्दों को लेकर उनका असंतोष एक झटके में उसी वक्त समाप्त हो गया, जब उन्हें खनिज विकास निगम के अध्यक्ष पद की कुर्सी सौंप दी गई।
आठ विधायकों के साथ बगावत करके सरकार को संकट में लाने वाले हरक सिंह रावत भी कभी विभागीय सचिव तो कभी मंडी परिषद अध्यक्ष बदलवाने के लिए सरकार विरोधी बयानबाजी करते रहे। फेरबदल के बाद वह फिर सत्ता के साथ सुर से सुर मिलाते नजर आए। सियासी संकट के दौरान बसपा विधायक हरिदास ने भी विरोधी स्वर उठाए, मगर मंत्री पद मिलने के बाद वे भी चुप्पी साध गए। इधर, राज्यसभा सीट के लिए प्रदीप टम्टा का नाम आने के बाद राजस्व मंत्री यशपाल आर्य ने तो देहरादून से दिल्ली तक विरोध के स्वर मुखर किए।
मगर अगले ही दिन ऊधमसिंह नगर में मनचाहे डीएम-एसपी की तैनाती भर से उनके विरोध के गुब्बारे से हवा निकल गई। इस मामले में पीडीएफ नेता दिनेश धनै का कोई जोड़ नहीं रहा। विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद धनै ने हरीश रावत की सरकार को समर्थन देने से साफ इनकार कर दिया। मगर पर्यटन मंत्रालय मिलने के वादे ने तो रुख ही बदल दिया।
इसके बाद हाल ही में राज्यसभा चुनाव में नामांकन कराने की जिद छोड़ने के एवज में टिहरी में मनचाहे अफसरों की पोस्टिंग के साथ-साथ गढ़वाल मंडल विकास निगम के अध्यक्ष की कुर्सी भी झटक ली। यह स्थिति तब है, जब सोमवार की रात तक दिनेश धनै किसी भी सूरत में राज्यसभा नामांकन से पीछे हटने की बात से मुकरते रहे। यहां तक कहा कि शहीद हो जाएंगे, मगर नामांकन हर हाल में कराएंगे।
लोकतंत्र में इसे एक बुराई के रूप में देखा जाता है। मगर राजनीतिक अस्थिरता के माहौल में इसे स्वाभाविक रूप से देखा जा सकता है। पूर्ण बहुमत की सरकारें जहां नहीं होती हैं, वहां ऐसी दिक्कतें होना सामान्य बात है। यह केवल राजनीतिक दबाव नहीं बल्कि समय की आवश्यकता कहा जा सकता है।
- सुरेंद्र कुमार, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार