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निठारी कांड के बाद सत्यार्थी ने ऐसे बचाया बचपन
विनोद काला/ अमर उजाला, बनबसा (चंपावत)
Updated Sun, 12 Oct 2014 04:05 PM IST
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शांति का नोबेल पुरस्कार के लिए चुने गए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के प्रणेता कैलाश सत्यार्थी उत्तराखंड के बनबसा भी आए थे।
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दक्षिण एशियाई बाल व्यापार विरोधी यात्रा
निठारी कांड के बाद 2007 में शुरू की गई दक्षिण एशियाई बाल व्यापार विरोधी यात्रा का नेतृत्व करते हुए यहां तक पहुंचे थे।
2007 में हुए निठारी कांड के बाद ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के प्रणेता सत्यार्थी ने बाल अत्याचार, बालश्रम मुक्ति को लेकर 25 फरवरी को कोलकाता से दक्षिण एशियाई बाल व्यापार विरोधी यात्रा शुरू की थी।
बांग्लादेश, नेपाल से होते हुए यात्रा 19 मार्च 2007 को बनबसा पहुंची थी। यात्रा में भारत, नेपाल, बांग्लादेश के 125 नागरिकों के साथ बालश्रम से मुक्त कराए गए 48 बच्चे भी शामिल थे। बनबसा से यात्रा खटीमा होते हुए दिल्ली पहुंची थी।
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बनबसा में पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष बहादुर सिंह पाटनी की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में सत्यार्थी ने बालश्रम, बंधुआ मजदूरी, बाल अत्याचार और बाल उत्पीड़न को समाज के लिए कलंक बताते हुए लोगों से आंदोलन में शामिल होने की अपील की थी।
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दिल्ली में हुआ था यात्रा का समापन
निठारी कांड के बाद 25 फरवरी 2007 को दक्षिण एशियाई बाल व्यापार विरोधी यात्रा कोलकाता से शुरू होकर कृष्णनगर, बहरामपुर, माल्दाह, किशनगंज, सिलीगुड़ी, विराटनगर, फोरबेसगंज, पूर्णिया, बेगुसराय, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, बेतिया, गोरखपुर, नौतनवां, नेपालगंज, लखीमपुर, धनगढ़ी, महेंद्रनगर होते हुए 19 मार्च 2007 को बनबसा पहुंची थी। 22 मार्च 2007 को दिल्ली में यात्रा का समापन किया गया था।