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38वें राष्ट्रीय खेल की तैयारी हवा हवाई, खिलाड़ी भी नहीं है भाई
अभिषेक सिंह/ अमर उजाला, हल्द्वानी
Updated Thu, 06 Jul 2017 11:20 AM IST
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उत्तराखंड सरकार ने 38वें राष्ट्रीय खेल की तैयारी को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हैं लेकिन तैयारी की गति और जमीनी हकीकत देखकर यह दावे हवा हवाई ही नजर आते हैं। मुख्यमंत्री ने खेल मंत्री से लेकर आला अधिकारियों तक को तलब करके सोमवार को तैयारियों के लिए बैठक भी बुला ली। बेहतर रिजल्ट के लिए जरूरत पड़ने पर विदेशी कोच तक की व्यवस्था करने का फरमान सुना दिया। पर, लगता है मुख्यमंत्री को हकीकत पता ही नहीं है या आला अधिकारी उनसे हकीकत छिपा रहे हैं।
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दरअसल, उत्तराखंड के कई बड़े नाम या तो केंद्रीय सेवाओं (सर्विसेज) से खेलते हैं, या फिर दूसरे राज्यों से। इनमें ओलंपियन वंदना कटरिया से लेकर ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले बॉक्सिंग खिलाड़ी कविंद्र बिष्ट समेत कई बड़े नाम हैं। ऐसे में क्या ये खिलाड़ी अपनी टीम को छोड़कर राष्ट्रीय खेल में उत्तराखंड के बैनर तले नजर आएंगे? इस बारे में पूर्व खिलाड़ियों का कहना है नहीं, ये लोग नहीं आएंगे और एक तरह से अपने ही प्रदेश के खिलाफ यह मैदान में उतरेंगे। इसकी बड़ी वजह खेल कोटे के तहत होने वाली भर्तियां हैं जो राज्य में 2011 से बंद हैं। इसके अलावा राज्य में खेल के लिए बेहतर आधारभूत ढांचा नहीं होना भी एक अहम कारण है।
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केरल में 2015 में हुए राष्ट्रीय खेलों की पदक तालिका की बात करें तो उत्तराखंड टॉप टेन में भी नहीं था। एक गोल्ड, 4 सिल्वर समेत 17 पदक हासिल करने वाला उत्तराखंड पदक तालिका में 24वें पायदान पर था। उस समय काफी हो हल्ला भी मचा, लेकिन फिर शांति छा गई। एक बार फिर से राष्ट्रीय खेल होने हैं। इनका आयोजन उत्तराखंड में होना है, ऐसे में खिलाड़ियों से उम्मीदें काफी ज्यादा हैं। बिना बेहतर कोच और अच्छी सुविधाओं के खिलाड़ी इन जिम्मेदारियों का बोझ कैसे उठा पाएंगे, यह अहम सवाल है। वह भी तब जबकि दूसरे राज्य बेहतर नौकरी के साथ बांहें फैलाये उनका स्वागत करने को तैयार बैठे हैं।
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विदेशी कोच लाने की बात की जा रही है लेकिन यहां तो अपने यहां के प्रशिक्षकों को ही बेहतर सुविधा नहीं दी जा रही, उन पर भरोसा नहीं किया जा रहा है। उनपर भरोसा कर बेहतर सुविधाएं दी जाएं तो यही प्रशिक्षक बेहतर रिजल्ट देकर दिखाएंगे। एक जानकारी के मुताबिक प्रदेश में अधिकतर प्रशिक्षक ठेके पर हैं। ये कैंपों में खिलाड़ियों को तैयार करते हैं लेकिन कई बार बजट का हवाला देकर कैंप बंद कर दिया जाता है और ये प्रशिक्षक भी वेतन के अभाव में घर बैठ जाते हैं। ऐसी व्यवस्था में खिलाड़ी कहां तक पदक लाने की जिम्मेदारी का बोझ उठा पाएंगे। इस बारे में जब खेल मंत्री अरविंद पांडे से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने फोन नहीं उठाया, मैसेज का जवाब भी नहीं मिला।
बड़े नाम जो दूसरे राज्य या विभागों के लिए खेलते हैं
वंदना कटरिया (हॉकी- यूपी), राजा रावत (फुटबाल-कस्टम), मीना उपाध्याय (हैंडबॉल-पंजाब), कविंद्र बिष्ट (बॉक्सिंग-एयरफोर्स), बहादुर राणा (बॉक्सिंग-सेना), अमित कार्गी (बॉक्सिंग-सेना), दीपा बिष्ट (बॉक्सिंग-आईटीबीपी), अंजली मेहता (बॉक्सिंग-आईटीबीपी), ज्योति बोरा (बॉक्सिंग-आईटीबीपी), नीलम (बॉक्सिंग-एसएसबी), प्रियंका चौधरी (बॉक्सिंग-रेलवे), मोनिका सोन (बॉक्सिंग-रेलवे), विनित मलिक (एथलेटिक्स-सर्विसेज), नितेंद्र रावत (एथलेटिक्स-सर्विसेज), चिराग सेन (बैडमिंटन-एयर इंडिया) समेत कई नामी खिलाड़ी दूसरे राज्यों से खेलते हैं।
संभावित भी नहीं चुने गए...
राष्ट्रीय खेल के लिए एक साल से भी कम का समय बचा है, ऐसे में उत्तराखंड को अलग-अलग खेलों में भाग लेने के लिए अपनी संभावित टीम चुन लेनी चाहिए, ताकि खिलाड़ियों को पर्याप्त तैयारी का मौका मिल सके। लेकिन उत्तराखंड ने अभी तक एक भी खेल में संभावित खिलाड़ी नहीं चुने हैं।
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा
प्रदेश के जो खिलाड़ी दूसरे राज्यों या विभागों से खेल रहे हैं, अगर उत्तराखंड सरकार उन्हें बेहतर नौकरी का प्रस्ताव और मेडल लाने पर आकर्षक उपहार देने की घोषणा करे तो ये खिलाड़ी जरूर अपने राज्य की ओर लौटेंगे।
खिलाड़ियों के बोल
अधिकतर खिलाड़ी राज्य की खेल नीति से ही संतुष्ट नहीं है। नाम नहीं छापने की शर्त पर कई खिलाड़ियों ने बताया कि जूनियर लेवल पर बेहतर करने वाले खिलाड़ियों को अपने ही राज्य में रोकने के लिए बेहतर नौकरी और सुविधा देने की कोशिश सरकार की ओर से नहीं की जाती है। ऐसे में न चाहते हुए भी पारिवारिक मजबूरी और खेल पर हो रहे खर्चों को पूरा करने के लिए खिलाड़ियों को केंद्रीय सेवाओं या दूसरे राज्य का रुख करना पड़ता है। कई खिलाड़ियों ने तो यहां तक कहा कि कौन खिलाड़ी अपने राज्य से नहीं खेलना चाहता है। हम भी चाहते हैं, बशर्ते सरकार हमारी ओर ध्यान तो दे। सीधी भर्ती में 10 फीसदी आरक्षण के सवाल पर खिलाड़ियों का कहना था कि जो खिलाड़ी मैदान पर छह से सात घंटे बिताता हो उसका मुकाबला दिन भर पढ़ाई करके नौकरी की तैयारी करने वाले युवा से कैसे हो सकता है।