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शादी के बाद नहीं बनी तो डाइवोर्स के बजाय ये तरीका अपना रहे जोड़े

Fri, 16 Jun 2017 08:51 AM IST
नलिनी गुसाईं / अमर उजाला, देहरादून
नलिनी गुसाईं / अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 16 Jun 2017 08:51 AM IST
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तलाक

शादीशुदा जोड़ों में बढ़ती कलह से बचने के नए तरीके निकाल लिए हैं। बच्चों के भविष्य को देखते हुए यह लोग डाइवोर्स नहीं ले रहे हैं बल्कि सेपरेशन को तवज्जो दे रहे हैं।

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दंपति बच्चों के भविष्य और सामाजिक बाध्यताओं के चलते ऐसा फैसला ले रहे हैं। इसमें कोई लीगल इश्यू भी नहीं है। ऐसे में बच्चे अपनी इच्छानुसार कभी मां तो कभी पिता के साथ रह रहे हैं। ऐसे मामले मेरिटल डिसकॉर्ड (वैवाहिक जीवन में कलह) विषय पर किए गए सर्वे में सामने आएं हैं।
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उत्तरांचल महिला एसोसिएशन (उमा) की ओर से उत्तराखंड के सौ ऐसे कपल्स पर मेरिटल डिसकॉर्ड को लेकर सर्वे किया गया, जिनमें से कुछ शादी के एक साल बाद ही तो कुछ पांच से दस साल बाद अलग-अलग रहने लगे। सर्वे में जब इनसे पूछा गया कि डाइवोर्स क्यों नहीं लिया? तो सभी के मिलते-जुलते जवाब मिले।
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इसमें यही सोच सामने आई कि बच्चों को माता और पिता दोनों की जरूरत है। ऐसे में बच्चे दोनों के पास मर्जी से रह सकते हैं। आपसी झगड़ों से परेशान होकर उन्होंने यह फैसला लिया। आज भले ही उन लोगों की आपस में नहीं बन रही है लेकिन भविष्य में साथ भी रह सकते हैं। इसके साथ ही कुछ सामाजिक बाध्यताओं के चलते भी डाइवोर्स नहीं ले पाते हैं। वहीं कचहरी के झंझटों से बचने का भी यह सही तरीका है और दोनों शांति से अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

काउंसिलर्स करते हैं बात 

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झांसी में आर्मी की डिसकाउंसिलर एवं मनोवैज्ञानिक दून निवासी डॉ. श्रवि अमर अत्री ने बताया कि ऐसे मामलों में रेशनल इमोटिव बिहेवियर थैरेपी (आरईबीटी) के जरिये कपल्स से बात की जाती है।

इसमें दोनों के मन की बात को जानने का प्रयास किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार तीन से चार बार बुलाकर बात की जाती है। इसके साथ ही काफी सोच समझ कर इस तरह का निर्णय लेने के लिए समझाया जाता है।

आपसी सहमति के फायदे 
- माता-पिता के झगड़ों का शिकार बच्चे नहीं होते। ऐसे में कोई लीगल इश्यू भी नहीं बनता। ऐसे में बच्चे अपनी इच्छानुसार मां या पिता के पास रह सकते हैं।
- ऐसा मेंटीनेंस भी नहीं देना होता जिससे पुरुष पर ज्यादा आर्थिक बोझ पड़े। आपसी सहमति से खर्च आदि तय कर लिया जाता है।
- भविष्य में साथ रहने की इच्छा हो तो साथ भी हो सकते हैं। इसमें कोई लीगल इश्यू आड़े नहीं आता। 

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sadhna
कुछ बानगी ... 
धर्मपुर निवासी ममता ने बताया कि शादी के डेढ़ साल बाद वह पति से अलग हो गई थी। छह महीने से अलग रह रही हैं। बताया कि दोनों ने आपसी सहमति से अलग रहने का फैसला किया था। पति से कोई झगड़ा नहीं है। उनका एक बेटा है जो कि ममता के ही पास है, पति की जब इच्छा होती है बेटे से मिलने आ जाते हैं। फिलहाल साथ रहने की कोई इच्छा नहीं है लेकिन भविष्य में सब ठीक लगा तो इस बारे में सोचा जा सकता है।

रायपुर निवासी सोनू ने बताया कि शादी के बाद से ही पत्नी के साथ झगड़े शुरू हो गए थे। दो साल तक जब यही स्थिति रही तो आपसी रजामंदी से अलग होने का निर्णय लिया। उनकी एक बेटी है जो पत्नी के पास है। पत्नी और बेटी का खर्च सोनू ही उठाते हैं। उनके बीच अब कोई झगड़ा नहीं है। कभी-कभी मिल भी लिया करते हैं।

उत्तराखंड के सौ ऐसे कपल्स से बात की गई। पुरुषों की संख्या में महिलाओं ने अधिक संख्या में सेपरेशन पर जोर दिया। महिलाएं डाइवोर्स से बचना चाहती हैं लेकिन जीवन में शांति से रहने के लिए अलग हो जाती हैं। उनका यह भी मानना है कि कुछ समय बाद यदि चिंतन करने पर यदि साथ रहने की सोचें तो वह विकल्प तो हमारे सामने हो। 
- साधना शर्मा, अध्यक्ष, उत्तरांचल महिला एसोसिएशन
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