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नेपाल से लौटे दो दोस्तों से सुनें बर्बादी की खौफनाक दास्तां

Fri, 01 May 2015 04:31 PM IST
दीपक मिश्रा/ अमर उजाला, रुड़की
दीपक मिश्रा/ अमर उजाला, रुड़की Updated Fri, 01 May 2015 04:31 PM IST
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nepal earthquake witness come back to india.

रुड़की निवासी गौरव जैन और जितेंद्र गोस्वामी नेपाल में भूकंप के खौफनाक मंजर को पलभर के लिए भी नहीं भूल पा रहे हैं। काठमांडू से लौटे दोनों लोगों ने तबाही को इतने नजदीक से देखा है कि उन्हें बार-बार लगता है कि धरती अब भी हिल रही है, भूकंप आ रहा है।

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सिविल लाइंस निवासी गौरव जैन और आदर्शनगर निवासी जितेंद्र गोस्वामी 25 अप्रैल को उस समय नेपाल में ही थे, जब भूकंप आया था। गौरव जैन काठमांडू स्थित फोनिक्स इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट में एडमिशन हेड और जितेंद्र गोस्वामी असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।
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25 अप्रैल को काठमांडू स्थित होटल माउंटेन में दोनों ठहरे हुए थे। दोनों ने नाश्ता किया ही था कि उन्हें अपने बेड हिलते नजर आए। इसके बाद दरवाजा, खिड़की आदि सभी कुछ हिलने लगा। उस समय दोनों दूसरी मंजिल पर थे।
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खिड़की से सड़क की ओर देखा तो दोनों कांप गए। होटल के सामने की सड़क देखते ही देखते फट गई थी। इस पर दोनों तुरंत होटल से बाहर निकल आए। बताया कि उनके सामने ही बिल्डिंग ताश के पत्तों की तरह से ढह रहीं थीं।

समझ में नहीं रहा था कि क्या हो रहा है। बस सुनाई दे रही थी तो बिल्डिंग गिरने की आवाज और चीख पुकार। लोग इधर से उधर दौड़ रहे थे। बड़ी मुश्किल से बचते बचाते एक मैदान में पहुंचे।

आफ्टर शॉक आते ही चीख पड़ते थे लोग

nepal earthquake witness come back to india.

जैसे-तैसे वह एयरपोर्ट पहुंचे। वहां भी काफी भीड़ थी। इसी बीच उनके मोबाइल से घर पर संपर्क हो गया। दोनों ने अपने परिजनों को सुरक्षित होने की बात कही। बताया कि वह तीन दिन तक एयरपोर्ट पर लाइन में लगे रहे। इस दौरान कई झटके आए होंगे।

झटके आते ही बच्चे महिलाएं और यहां तक आदमी भी चीख पड़ते थे। गौरव ने बताया मंगलवार को हवाई जहाज से वह देश लौटे। जितेंद्र का नंबर पीछे था। इसलिए वह बस से आए। काठमांडू से गोरखपुर, वहां से लखनऊ।

लखनऊ से वह ट्रेन से रुड़की पहुंचे। दोनों ने बताया कि वह सुरक्षित रुड़की पहुंच चुके हैं, लेकिन अब भी उन्हें हर पल लगता है मानो धरती हिल रही है। आपबीती बताते हुए दोनों की आंखों में खौफ साफ झलक रहा था।

भारतीय वायुसेना ने बढ़ाई हिम्मत

गौरव जैन और जितेंद्र गोस्वामी ने बताया कि भूकंप के कारण हर चेहरे पर खौफ और बेबसी थी। नेपाल सरकार की ओर से कोई बचाव कार्य शुरू नहीं किया था। लग रहा था कि यहां कोई है ही नहीं।

भूकंप आने के करीब चार घंटे बाद ही काठमांडू में भारतीय वायुसेना के जवान रेस्क्यू करते दिखाई दिए। जिन्हें देख भूकंप के खौफ और बेबसी के कारण पूरी तरह से निराश दिख रहे लोगों के चेहरों पर एक आस दिखाई दी।

600 रुपये में पानी की बोतल
नेपाल में आए भूकंप के बाद हर कोई पीड़ितों की मदद करना चाहता है। लेकिन ऐसे हालात में भी लोभियों ने पीड़ितों को और पीड़ा दी। 20 रुपए की पानी की बोतल एयरपोर्ट पर 500-600 रुपए की दी गई। जबकि आधे लीटर कोल्ड ड्रिंक्स की बोतल 800 रुपये में। इसी तरह से चाव-चाव (मैगी जैसा) का पैकेट 80 रुपए का दिया गया। जबकि इसका रेट 15 रुपए है।

‘जाको राखे साइयां मार सके न कोय’

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‘जाको राखे साइयां मार सके न कोय’ कहावत भारतीय मूल के अप्रवासी जनक पटेल और उनकी बेटी जेसिक पटेल पर सटीक बैठती है। पटेल अपनी एमबीबीएस कर चुकी बेटी को काठमांडू में इंटर्नशिप कराने के लिए 25 अप्रैल को फ्लाइट से रवाना हुए। मार्ग में उन्हें नेपाल में भूकंप से त्रासदी की सूचना मिली। पायलट को विमान को लखनऊ में उतारना पड़ा। जिससे वे उक्त घटना का शिकार होने से बाल बाल बच गए।

बकौल जनक पटेल वे तीन अप्रैल को तीर्थनगरी ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन आए थे। बेटी ने लंदन से एमबीबीएस किया है। उसे इंटर्नशिप के लिए 25 अप्रैल को काठमांडू पहुंचना था। वे 11 अप्रैल को आश्रम से अपने पैतृक गांव सूरत (गुजरात) गए।  25 अप्रैल की सुबह बेटी संग मुंबई पहुंचे और वहां से 11 बजे नेपाल के लिए जेट एयरवेज की फ्लाइट पकड़ी।

विमान में लगभग दो घंटे बाद पायलट को नेपाल में भूकंप की सूचना मिली। लिहाजा पायलट ने सूझबूझ से लखनऊ में इमरजेंसी लैंडिंग ली। करीब चार घंटे लखनऊ हवाई अड्डे में फ्लाइट में ही रहे, इसके बाद दिल्ली के लिए उड़ान भरी।

पटेल 27 अप्रैल को सकुशल आश्रम में पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि पहले उनकी बुकिंग 24 अप्रैल की थी, लेकिन किसी कारणवश वह उस दिन नहीं जा पाए थे। बकौल पटेल हम भगवान के शुक्रगुजार हैं कि उस दिन नेपाल नहीं गए और त्रासदी का शिकार होने से बाल बाल बच गए।

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