लहरों पर नाचते रंग देख ठनका था वैज्ञानिक का माथा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के ब्राह्मण परिवार में जन्मे चंद्रशेखर वेंकट रमन 12 साल की उम्र में मैट्रिक परीक्षा पास कर ली थी।
पढ़ें, छेड़छाड़ प्रकरणः ऐसे हुई थी हरक की युवती से मुलाकात
पढ़ाई पूरी करने के बाद चंद्रशेखर वेंकट रमन 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्राध्यापक बने।
पढ़ें, पंचायत में पद चाहिए तो मायके जाना होगा
यहां रमन ने वस्तुओं में प्रकाश के चलने का अध्ययन किया तो पाया कि किरणों का समूह बिल्कुल सीधा नहीं चलता। कुछ भाग राह बदलकर बिखर जाता है।
पढ़ें, नागफनी, उत्तराखंड को बना सकती है धनी
1921 में ऑक्सफोर्ड की कांग्रेस से जलयान के जरिए लौटते हुए भूमध्य सागर के पानी में अनोखा नीला और दूधियापन देखा तो चौंके। कलकत्ता पहुंचकर रमन ने वस्तुओं में प्रकाश के बिखरने का नियमित अध्ययन शुरू किया।
प्रकाश के बिखरने का नियमित अध्ययन शुरू किया
करीब सात साल बाद रमन ने अंततः अपनी जिज्ञासा का हल खोज ही लिया। 1927 में ख्याल आया, एक्स किरणें प्रकीर्ण होती है तो उनकी तरंग की लम्बाई बदल जाती हैं। ऐसा फिर तो साधारण प्रकाश में भी होना चाहिए।
पढ़ें, छेड़छाड़ प्रकरणः ऐसे हुई थी हरक की युवती से मुलाकात
पारद आर्क के प्रकाश का स्पेक्ट्रम स्पेक्ट्रोस्कोप बनाया और दोनों के बीच अलग-अलग रसायनिक पदार्थ रखे। आर्क के प्रकाश को इससे गुजार कर स्पेक्ट्रम बनाए। देखा कि हर स्पेक्ट्रम में अंतर आ रहा है। हर एक पदार्थ अपना -अपना अंतर डालता है।
पढ़ें, पंचायत में पद चाहिए तो मायके जाना होगा
श्रेष्ठ स्पेक्ट्रम चित्र बनाकर कैल्कुलेशन के बाद सैद्धान्तिक व्याख्या कर दी गई। इससे सिद्घ किया गया कि यह अन्तर पारद प्रकाश की तरंग लम्बाइयों में बदलाव से पड़ता है। इस तरह रमन प्रभाव की खोज हुई।
पढ़ें, नागफनी, उत्तराखंड को बना सकती है धनी
उनके नाम के आधार पर इसे रमन प्रभाव कहा गया। इस खोज का एलान रमन ने २९ फरवरी सन 1928 को की। महान वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रमन की खोज 'रमन प्रभाव' के दिन 28 फरवरी को हर साल राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है।
आज के दिन किया था सिद्धांत का प्रतिपादन
1930 में भौतिकी का नोबल पाने वाले रमन ने आज के दिन ही अपने सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
पढ़ें, छेड़छाड़ प्रकरणः ऐसे हुई थी हरक की युवती से मुलाकात
नेशनल काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी कम्यूनिकेशन के आग्रह पर सरकार 1986 से 28 फरवरी को विज्ञान दिवस के तौर पर मनाती आई है।
पढ़ें, पंचायत में पद चाहिए तो मायके जाना होगा
2009 से सूचना एवं तकनीकी मंत्रालय युवाओं को बढ़ावा देने में योगदान देने वाली पांच संस्थाओं, वैज्ञानिकों और गैरसरकारी संस्थाओं को सम्मानित कर रही है। पहला अवॉर्ड विक्रम साराभाई कम्यूनिटी साइंस सेंटर को मिला था।
पढ़ें, नागफनी, उत्तराखंड को बना सकती है धनी
2013 में अमेरिकन केमिकल सोसायटी ने रमन प्रभाव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिस्टोरिक केमिकल लैंडमार्क घोषित किया। साल 2014 के लिए इस दिन की थीम फॉस्टरिंग साइंटिफिक टेंपर है।
किताबों से बाहर है विज्ञान
विज्ञान को महज किताबों से नहीं समझा जा सकता। नेशनल साइंस डे पर विभिन्न संस्थानों ने कुछ यही सोच रखते हुए छात्र-छात्राओं को विज्ञान का महत्व समझाने के लिए कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया है।
पढ़ें, छेड़छाड़ प्रकरणः ऐसे हुई थी हरक की युवती से मुलाकात
वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान की ओर से विभिन्न स्कूलों को आमंत्रित किया गया है। यह छात्र-छात्राएं सुबह नौ बजे से संस्थान के म्यूजियम घूम सकेंगे।
पढ़ें, पंचायत में पद चाहिए तो मायके जाना होगा
वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुशील कुमार के अनुसार संस्थान के विशेषज्ञ भी उनके हर सवाल का जवाब देने के लिए इस दौरान मौजूद रहेंगे।
पढ़ें, नागफनी, उत्तराखंड को बना सकती है धनी
उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकास्ट) और ओएनजीसी साथ मिलकर नेशनल साइंस डे मना रहे हैं।
कौलागढ़ रोड स्थित एएमएन घोष आडिटोरियम में होने वाले इस कार्यक्रम में यूकास्ट की ओर से पूर्व में हुई निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत किया जाएगा।
पढ़ें, 4 मई को खोले जाएंगे केदारनाथ मंदिर के कपाट
यूकास्ट के अमित पोखरियाल के अनुसार दोपहर दो बजे से इसमें विभिन्न विषयों पर व्याख्यान भी होंगे।
डीआरडीओ के प्रोजेक्ट जो जिंदगी बना रहे आसान
ट्रीटेड वाटर किट
पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में शुद्ध पानी की अनुपलब्धता और गंदे पानी की बीमारियां रोकने के लिए पानी टेस्टिंग किट तैयार की है। इसे कोई भी गैर प्रशिक्षित आदमी भी आसानी से इस्तेमाल कर पानी जांच सकता है।
पढ़ें, छेड़छाड़ प्रकरणः ऐसे हुई थी हरक की युवती से मुलाकात
इसके जरिए पानी में बैक्टीरिया, सफाई और केमिकल्स आदि को नुकसानदायक स्तर की पहचान की जा सकती है। इससे पानी की कठोरता, क्लोरीन, पीएच, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आयन और कोलीफॉर्म की जांच की जा सकती है।
फल-सब्जियों में कीटनाशकों की पहचान
खाद्य पदार्थों में शुद्धता सूक्ष्म जैविक आंकलन और कीटनाशकों की जांच के लिए डीआरडीओ ने एक तकनीकी ईजाद की है। इसके जरिए 84-88 फीसदी तक हानिकारक तत्वों और कैमिकल आदि का पता लगाया जा सकता है।
इससे फल और सब्जी में फंगस, मैलाथियान, डायमैथेट, इथियॉन क्लोरोपेरिफॉस का पता लगाया जा सकता है।
तो डेंगू का लार्वा पनपेगा ही नहीं
मच्छरों की करीब 400 प्ररजातियां मानवों में बीमारियां पहुंचाते हैं। इनमें पीला बुखार, डेंगू और दिमागी बुखार प्रमुख्ा हैं।
पढ़ें, पंचायत में पद चाहिए तो मायके जाना होगा
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक दुनिया में कम से कम 70 करोड़ लोग हर साल मच्छर जनित बीमारियों की चपेट में आते हैं। हर साल 17 में से एक आदमी की मौत मच्छरों के काटने से हुई बीमारी के चलते हो जाती है।
मौजूदा वक्त में इससे बचाव के लिए कोई वैक्सीन आदि नहीं है। डीआरडीओ की नई तकनीक से ऐसे मच्छरों के लार्वा को ही खत्म किया जा सकेगा।