राष्ट्रीय बालिका दिवस 2019: हौसला हो तो 'अंधेरे' में भी मिल जाते हैं रास्ते, संघर्ष भरी दास्तां
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अगर खुद पर भरोसा हो तो अंधेरे में भी रास्ते मिल ही जाते हैं... यह बात सुप्रिया वर्मा और अंबरी प्रवीण पर सटीक बैठती है। ये दोनों देख नहीं सकती हैं।
इसके बावजूद उन्होंने हौसला और कड़ी मेहनत से मुकाम पाया है। मंजिल तक पहुंचने का रास्ता कठिन था लेकिन बुलंद इरादों के सामने सभी बाधाएं बोनी साबित होती रहीं। उनकी सफलता और संघर्ष की कहानी, जानिये उन्हीं की जुबानी...
24 वर्षीय सुप्रिया वर्मा ने बताया कि वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर की निवासी हैं। साल 2007 में जब वह दसवीं कक्षा थी तो उन्हें ग्लूकोमा की बीमारी हो गई। जिसके कारण उन्हें दिखना बंद हो गया और पढ़ाई बीच में ही बंद हो गई। इसके पांच साल तक वह घर में ही रहीं। कहीं से पता चलने पर एक दिन एनआईईवीपीडी के एक शिक्षक ने उनके पिता से बात की। जिसके बाद वह एनआईईवीपीडी में शिक्षा ग्रहण करने यहां आ गईं। यहां आकर साल 2017 में स्नातक पास करने के साथ ही बैंकिंग सेवा के लिए परीक्षा पास की। अब वह उत्तराखंड ग्रामीण बैंक जाखन शाखा में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं।
2010 में दोबारा पढ़ाई शुरू की
झारखंड निवासी 26 वर्षीय अंबरी प्रवीण ने बताया कि वह चार भाई-बहन हैं, जिनमें से तीन ब्लाइंड (दृष्टिबाधित) हैं। बड़ी बेटी होने के कारण पिता जी को उनकी काफी चिंता रहती थी। साल 2006 में जब वह 10वीं कक्षा में थी तो एक दिन अचानक उनकी आंखों की रोशनी चली गई। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। ऐसे में चार साल तक पढ़ाई नहीं कर सकीं।
साल 2010 में दोबारा पढ़ाई शुरू की। 2013 में एनआईईवीपीडी पहुंची। इस बीच कंप्यूटर की शिक्षा भी ग्रहण की। उन्होंने बताया कि दिसंबर 2016 में बैंकिंग सेवा परीक्षा पास करने के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा की ईसी रोड शाखा में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर नियुक्त हुईं। बेहतर कार्य के लिए उन्हें एनआईईवीपीडी में तीन दिसंबर-2018 को नेशनल लाइफ अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया।