बंगाल से आए लाखों लोग भविष्य को लेकर चिंतित, नहीं हैं तीन पीढ़ियों से उत्तराखंड में रहने के सबूत
असम में 19 लाख से अधिक लोगों के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर से बाहर हो जाने के बाद प्रदेश में तीन पीढ़ियों से वास कर रहे तीन लाख से अधिक बांग्लादेशी शरणार्थी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। अधिक चिंता उन लोगों को है, जिन्होंने विभिन्न कारणों से शरणार्थी के रूप में उत्तराखंड में रहने के सबूत खो दिए हैं। ऐसे लोगों की संख्या हजारों में मानी जा रही है।
बंगाली यूथ आर्गेनाइजेशन के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट जीवन राय कहते हैं,‘ ऐसे तीन लाख से अधिक लोग हैं जो तीन पीढ़ियों से उत्तराखंड में रह रहे हैं, लेकिन आगजनी, बाढ़ और अन्य घटनाओं में इनमें से हजारों लोगों ने अपने दस्तावेजों खो दिए हैं, जो उनके शरणार्थी होने के सबूत थे। ऐसे लोगों को लेकर निश्चित तौर पर चिंता है।’ हालांकि 70 फीसदी लोगों के पास पर्याप्त दस्तावेज हैं, जो उनकी भारतीय नागरिकता का मजबूत आधार है।
भाजपा विधायक सौरभ बहुगुणा की राय जुदा
हालांकि सितारगंज के भाजपा विधायक सौरभ बहुगुणा की राय इससे थोड़ा जुदा है। वह कहते हैं, वो उत्तराखंड में 1965-75 के बीच विस्थापित हुए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें यहां बसाया। उन्हें जमीनों के पट्टे दिए। अब तो उन्हें भूमिधरी का अधिकार भी मिल चुका है।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के आदेश के बाद अब उन्हें जो प्रमाणपत्र जारी हो रहे हैं, उनमें पूर्वी पाकिस्तान नहीं लिखा जा रहा है। कोई संदेह नहीं कि वे भारतीय नागरिक हैं। बहुगुणा की मानें तो कुछ तत्व उन्हें रोहिंग्या मुसलमानों से जोड़कर गलत संदेश दे रहे हैं, जबकि उनका रोहिंग्याओं से कोई सरोकार नहीं है।’
आगजनी की घटनाओं में उनके प्रमाण पत्र भी जल गए
बांग्ला समुदाय से जुड़े लोगों की चिंता दूसरी है। उनका कहना है कि शरणार्थी होने के समय जो प्रमाणपत्र उनके पास है, असम में उसे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में नाम दर्ज कराने का आधार नहीं माना गया। प्रदेश में 1971 से पहले जितने बांग्लादेश से शरणार्थी आए उन्हें अपने भूमि, स्कूल से जुड़े सभी प्रमाणपत्र राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए अप्रैल 2020 तक जमा करने हैं। एडवोकेट जीवन राय कहते हैं, मुफिलिसी में हजारों शरणार्थियों ने फूस की झोपड़ियों में जीवन गुजारा।
गर्मियों में झोपड़ियां खाक हो जाती थीं। इन आगजनी की घटनाओं में उनके प्रमाण पत्र भी जल गए। चिंता ऐसे नागरिकों को लेकर है कि उनके भविष्य का क्या होगा, जबकि वे तीन पीढ़ियों से राज्य में रह रहे हैं और उनके बच्चे और परिवार वाले सरकारी नौकरियों तक में हैं। उनकी मानें तो पांच सितंबर को दिल्ली के जंतर मंतर में राष्ट्रीय संगठन की बैठक होगी, जिसमें सभी बांग्लादेशी शरणार्थियों की नागरिकता से संबंधित मसलों पर रणनीति बनाई जाएगी।