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भारत की इस जगह पर मिली कब्रों के पीछे छिपे हैं कई रहस्य

चंद्रेश पांडे-अंकुर शर्मा/ अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Sun, 21 May 2017 08:59 AM IST
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graveyard - फोटो : amar ujala

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निर्माणाधीन आईएसबीटी की भूमि में मिली कब्रों को लेकर पिछले कुछ समय से छाया कुहासा बृहस्पतिवार को कुछ हद तक छंट गया। पुरातत्वविद् यशोधर मठपाल ने इस स्थान का निरीक्षण करने के बाद बताया कि पहली नजर में कब्रें अधिकतम 50 से 60 साल पुरानी हो सकती हैं।
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यह भी नहीं लगता कि इन कब्रों का सीधा संबंध मुस्लिम समुदाय से या 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के वीर शहीदों से है। मठपाल के मुताबिक सबसे अधिक संभावना इसी बात की है कि किसी महामारी की चपेट में आने से मरे लोगों को यहां पर दफनाया गया हो। कब्रों को बनाने के तौर तरीके से हिंदुओं की प्रतीत होती है।


मठपाल बृहस्पतिवार को गौलापार उस वन भूमि पर कब्रों को देखने पहुंचे जहां इंटर स्टेट बस टर्मिनल निर्माणाधीन है। उन्होंने बताया कि अधिकांश कब्रें उत्तर-दक्षिण दिशा को इंगित करती हैं जो हिंदुओं की कब्रें होने का संकेत देता है, क्योंकि मुस्लिम समुदाय की कब्रों में पश्चिम की ओर सिर व पूरब की तरफ पैर किए जाते हैं।

कब्रों को सांप्रदायिक रंग नहीं देने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुओं में भी नाथ समुदाय में तो दफनाने के चलन है ही उसके अलावा जनेऊ संस्कार नहीं होने, नाबालिगों, सर्पदंश से हुई मौत में भी दफनाने का चलन है।
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अधिकतर छोटे बच्चों की हैं कब्र

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