भारत की इस जगह पर मिली कब्रों के पीछे छिपे हैं कई रहस्य
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निर्माणाधीन आईएसबीटी की भूमि में मिली कब्रों को लेकर पिछले कुछ समय से छाया कुहासा बृहस्पतिवार को कुछ हद तक छंट गया। पुरातत्वविद् यशोधर मठपाल ने इस स्थान का निरीक्षण करने के बाद बताया कि पहली नजर में कब्रें अधिकतम 50 से 60 साल पुरानी हो सकती हैं।
यह भी नहीं लगता कि इन कब्रों का सीधा संबंध मुस्लिम समुदाय से या 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के वीर शहीदों से है। मठपाल के मुताबिक सबसे अधिक संभावना इसी बात की है कि किसी महामारी की चपेट में आने से मरे लोगों को यहां पर दफनाया गया हो। कब्रों को बनाने के तौर तरीके से हिंदुओं की प्रतीत होती है।
मठपाल बृहस्पतिवार को गौलापार उस वन भूमि पर कब्रों को देखने पहुंचे जहां इंटर स्टेट बस टर्मिनल निर्माणाधीन है। उन्होंने बताया कि अधिकांश कब्रें उत्तर-दक्षिण दिशा को इंगित करती हैं जो हिंदुओं की कब्रें होने का संकेत देता है, क्योंकि मुस्लिम समुदाय की कब्रों में पश्चिम की ओर सिर व पूरब की तरफ पैर किए जाते हैं।
कब्रों को सांप्रदायिक रंग नहीं देने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुओं में भी नाथ समुदाय में तो दफनाने के चलन है ही उसके अलावा जनेऊ संस्कार नहीं होने, नाबालिगों, सर्पदंश से हुई मौत में भी दफनाने का चलन है।
अधिकतर छोटे बच्चों की हैं कब्र
मठपाल के मुताबिक पहली नजर में देखने में लगता है कि कोई दैवीय आपदा या महामारी के मृतकों को आनन फानन में दफनाया गया है। जब महामारी वगैरह में दफनाया जाता है तो ऊपर से पत्थर रख देते हैं, ताकि शव को जानवर नहीं निकाल सके और बीमारी नहीं फैल सके। इसके साथ ही कब्रें भी अधिकतर छोटे बच्चों की हैं जो इस धारणा को गलत साबित करती हैं कि ये कब्रें 1857 के युद्ध में मारे गए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की हैं।
उन्होंने बताया कि जब युद्ध में सैनिकों की मौत होती है तो सभी वीर शहीदों के शव समानांतर दफनाए जाते हैं। यहां कब्रें उस खास परंपरा व मान्यता के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने बताया कि अगर इतिहास पर गौर करे तो 1338 में मुहम्मद तुगलक ने हमला किया था, लेकिन सैनिकों में डायरिया फैला तो लौट गया। 1390 में दोबारा हमला किया। 1399 में तैमूर लंग भी केदारनाथ मंदिर को लूटने आया था लेकिन वह भी लौट गया।
16 वीं शताब्दी में हुसैन खान ने इस इलाके में डेरा डाला और पांच-छह माह तक रहा। इसके सैनिकों को पहाड़ के निवासी जहरीले तीरों से मारते थे, लेकिन ये छोटी कब्रें इनकी पुष्टि भी नहीं करती हैं। यहां सुल्ताना डाकू का इलाका था, लेकिन कब्रों से किसी जानवर, हथियार, बर्तन, मनके आदि नहीं निकले हैं तो डाकुओं की कब्र होना भी संभव नहीं है।
मठपाल के मुताबिक कब्रें चूने से बनी होतीं तो 150-200 साल पुरानी हो सकती थी। लेकिन इनके निर्माण में सीमेंट का इस्तेमाल हुआ है जिससे लगता है कि ये अधिकतम 50-60 साल पुरानी ही होंगी। हालांकि, इनकी सही उम्र कार्बन डेटिंग के बाद ही पता चल सकती है।