मसूरी गोलीकांड की 23वीं बरसी आज, आज भी सिहर उठते हैं लोग, जानिए क्या हुआ था उस दिन...
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आज मसूरी गोलीकांड की 23वीं बरसी है। 2 सितंबर 1994 की सुबह के पुलिस और पीएसी के उस तांडव को याद कर आज भी लोग सिहर उठते हैं। उस गोलीकांड में 6 आंदोलनकारी और एक डीएसपी की मौत हो गई थी।
उत्तराखंड अलग राज्य तो बन गया।
मगर आंदोलनकारियों और शहीदों के सपनों का राज्य नहीं बन सका है। यह टीस आज भी उनको सालती है। आंदोलनकारियों को मलाल है कि जिस ध्येय को लेकर लोगों के सीने छलनी हुए और मुजफ्फरनगर में महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़ किया गया। सपनों का वह राज्य नहीं बन सका है। उन्होंने इसके लिए राजनीति को जिम्मदार ठहराया।
प्रमुख महिला राज्य आंदोलनकारी और 14 वर्ष तक मसूरी गोलीकांड में सीबीआई के मुकदमे झेलने वाली सुभाषिनी बर्त्वाल का कहना है कि राज्य निर्माण में जिनकी भूमिका अहम थी। वे आज उपेक्षित हैं। सत्ता में कुछ ऐसे भी लोग रहे हैं, जिन्होंने अलग राज्य आंदोलन का विरोध किया था।
पुलिस-प्रशासन ने खेला था खूनी खेल
मसूरी में 2 सितंबर 1994 की सुबह झूलाघर में पुलिस-प्रशासन ने खूनी खेल खेला था। जिसमें राय सिंह बंगारी, हंसा धनाई, बेलमती चौहान, धनपत, मदनमोहन मंमगई और बलवीर पुलिस की गोलियों के शिकार हो गए थे। झूलाघर में पुलिस और पीएसी से लड़ते हुए कई आंदोलनकारियों के पैर टूट गए थे तो कई को गंभीर चोटें आईं थीं। इस दौरान एक डीएसपी की भी मौत हो गई थी।
घायल होने वालों में प्रमुख नाम एडवोकेट राजेंद्र सिंह पंवार का है। उनके पिता हुकुम सिंह पंवार इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। महिलाओं बचाते हुए राजेंद्र पंवार को गोली लग गई थी। उन्हें कई महीनों तक दिल्ली एम्स में रखा गया था। आज भी उनके गले से आवाज ठीक से नहीं निकल पाती है। मसूरी गोलीकांड की लाइव फोटोग्राफी करने वाले हरि सिंह गुनसोला की फोटो के आधार पर शहीदों के परिजनों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दस-दस लाख का मुआवजा दिया था। राज्य आंदोलनकारियों में उनका चिन्हीकरण आज तक भी नहीं हुआ है। इससे चिन्हीकरण प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हैं।
गोलीकांड के बाद जो तांडव पुलिस और पीएसी किया था, उसने मानवता को कलंकित करने वाली हदें पार कर दी थी। 15 दिन तक कर्फ्यू लगाया गया। रात में पुलिस और पीएसी ने घरों में घुसकर लोगों को बाहर भगाया था। आंदोलन को कुचलने के लिए कई हथकंडे अपनाए गए, मगर आंदोलन और तेज होता चला गया।
उत्तराखंड आंदोलनकारी मंच के अध्यक्ष देवी प्रसाद गोदियाल और महिला आंदोलनकारी सुभाषिनी बर्त्वाल ने सरकार से मांग की ऐसे आंदोलनकारियों को चिन्हीकरण कर उन्हें सम्मान दिया जाए।