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Mother's Day: एकल मां, दोहरी जिम्मेदारी; जिंदगी के तूफानों से लड़कर शमा ने रोशन किया अपने बच्चाें का जीवन

Fri, 08 May 2026 04:21 PM IST
Alka Tyagi Alka Tyagi
Updated Fri, 08 May 2026 04:21 PM IST
सार

हर चुनौती के बीच उन्होंने बच्चों को बेहतर जिंदगी देने का सपना जिंदा रखा। उन्होंने बच्चों को तो बेहतर जीवन दिया ही खुद भी अपनी पहचाई बनाई। आज उनके बच्चे जिस मुकाम पर हैं, वह मां की ममता, त्याग और अटूट हिम्मत की सबसे खूबसूरत मिसाल है।

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Mother's Day 2026 Dehradun teacher and writer shama khan Struggle Story after her husband Died
बच्चों के साथ शमा खान - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

अपने हिस्से के गम छुपाकर मुस्कुराती रही, वो मां थी, बच्चों को ही अपनी दुनिया बनाकर जीती रही...ये लाइनें सटीक बैठती हैं दून निवासी शमा खान पर। 30 वर्ष की उम्र में जब जीवनसाथी का साथ छूटा तब उनके सामने सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि तीन मासूम बच्चों की जिम्मेदारी भी थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अकेले ही संघर्ष करते हुए मां और पिता दोनों की जिम्मेदारी निभाई। हर चुनौती के बीच उन्होंने बच्चों को बेहतर जिंदगी देने का सपना जिंदा रखा। उन्होंने बच्चों को तो बेहतर जीवन दिया ही खुद भी अपनी पहचाई बनाई। आज उनके बच्चे जिस मुकाम पर हैं, वह मां की ममता, त्याग और अटूट हिम्मत की सबसे खूबसूरत मिसाल है।

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शमा खान ने बताया कि वह नागपुर में रहती थीं। उनके पति अब्दुल मुबीन खान का इंतकाल एक सड़क हादसे में वर्ष 1982 में हो गया था। उस वक्त उनके दो बेटे और एक बेटी थी। पति का साथ छूटा तो बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ गई। आर्थिक तंगी हुई तो उन्होंने नौकरी करने की ठानी और बीएड की पढ़ाई शुरू की। इस दौरान उन्होंने नाइट स्कूल में छह माह काम भी किया। इसके बाद शिक्षक बनीं। पहली सैलरी उन्हें 50 रुपये मिली, जिससे घर का कुछ ही खर्च निकलता था। इसलिए उन्होंने ट्यूशन भी पढ़ाया।
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1984 में उन्होंने केंद्रीय विद्यालय में परीक्षा दी और उनका सिलेक्शन प्राइमरी टीचर के पद पर हुआ। इसके बाद उन्होंने कभी जीवन की परेशानियों को मुड़कर नहीं देखा। इस बीच कई उतार चढ़ाव आए और वह केंद्रीय विद्यालय से वर्ष 2009 में प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुईं। इस बीच उनके बेटे की पोस्टिंग देहरादून हुई तो वह यहां शिफ्ट हो गईं। अब वह दून में ही मदरसे में कॉर्डिनेटर के पद पर काम कर रही हैं।
 



तीनों बच्चों ने बढ़ाया मां का मान
शमा ने जितना संघर्ष किया उनके बच्चों ने भी उसे समझा ओर जीवन की बेहतर राह चुनी। आज उनका बड़ा बेटा फिरोज़ पाशा (45) मर्चेंट नेवी में कैप्टन है। दूसरा बेटा एजाज़ परवेज़ खान(43) देहरादून रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन(डीआरडीओ) में साइंटिस्ट(एस) है। वहीं बेटी यास्मीन(40)उत्तर प्रदेश में स्टेट स्कूल में साइंस की प्रवक्ता हैं।

लेखन और मंचन से भी बनाई पहचान
शमा खान एक शिक्षिका होने के साथ ही बेहतरीन लेखिका भी हैं। उन्होंने केंद्रीय विद्यालय में नौकरी के दौरान ही लेखन की शुरुआत की और कई कहानियां, कविताएं और गज़लें लिखी हैं। अब तक उनकी 10 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और 200 से ज्यादा कहानियां अलग-अलग पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी में भी उनकी कहानियां लगातार प्रसारित होती रही हैं। जेल में बेवजह सजा काट रहे कैदियों पर लिखी उनकी किताब काफी चर्चित रही। वह ड्रामा आर्टिस्ट भी रहीं। उन्होंने रामलीला में भी काम किया।
 
मां ने साथ दिया तो मिली हिम्मत
शमा ने बताया कि जब उनके पति का साथ छूटा तो लोगों ने कहा दूसरा निकाह कर लो, लेकिन जब उन्होंने बच्चों को ही अपनी दुनिया बनाने की ठानी तो मां ने साथ दिया। मां उनका सहारा बनी और पढ़ाई व नौकरी के दौरान उन्होंने बच्चों को संभालने में उनकी काफी मदद की।

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