उत्तराखंड: पीडीएफ छोड़ 'घर' वापस आए दुर्गापाल
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उत्तराखंड में कांग्रेस का पलड़ा भारी हो गया है। कांग्रेस की सहयोगी पार्टी पीडीएफ के मंत्री हरीश दुर्गापाल मंगलवार को कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।
प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की मौजूदगी में हरीश दुर्गापाल ने समर्थकों के साथ कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।
दुर्गापाल के प्रगतिशील प्रजातांत्रिक गठबंधन (पीडीएफ) छोड़ने के बाद कुछ अन्य सदस्यों के भी कांग्रेस में जाने का रास्ता खुल गया है। हालांकि कांग्रेस की मंशा विधानसभा चुनाव तक पीडीएफ सदस्यों को कांग्रेस में शामिल करने या फिर उनके किनारा कर लेने की है।
हरीश चंद्र दुर्गापाल लंबे समय से कांग्रेस में आने की सोच रहे थे। वित्त मंत्री इंदिरा ह्दयेश के करीबी माने जाने वाले दुर्गापाल मौके की तलाश में थे। मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रस्ताव पर उन्होंने तत्काल हामी भर दी। हालांकि उन्होंने अपने समर्थकों से भी रायशुमारी कर नफा-नुकसान देखकर ही कांग्रेस में वापसी की है।
मूलरूप से कांग्रेसी हैं श्रम मंत्री
दुर्गापाल मूलरूप से कांग्रेसी हैं। वे 2002 लालकुआं विधानसभा से कांग्रेस के विधायक रहे हैं। हालांकि 2007 में कांग्रेस के टिकट पर वे चुनाव हारे भी थे। कांग्रेस ने 2012 विधानसभा में उन्हें टिकट नहीं दिया।
लालकुआं में दुर्गापाल की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत गए। पार्टी से बगावत के चलते कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया।
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के समय सबसे पहले कांग्रेस की किसी पर नजर गई तो वे दुर्गापाल ही थे। दुर्गापाल कांग्रेस सरकार के अंग के रूप में पीडीएफ में शामिल हो गए और प्रदेश के मंत्री हैं।
मुख्यमंत्री हरीश रावत के कहने और इलाके केलोगों की भावनाओं के चलते ही कांग्रेस में वापसी कर रहा हूं। स्थानीय कार्यकर्ताओं के निर्देश पर ही फैसला लिया है मेरे साथ बड़ी संख्या में समर्थक भी कांग्रेस में लौट रहे हैं।
- हरीश चंद्र दुर्गापाल, श्रम मंत्री
दुर्गापाल को पार्टी में लाना रावत का सियासी दांव
हरीश चंद्र दुर्गापाल की घर वापसी हरीश रावत का राजनैतिक दांव भी हो सकता है। लंबे समय से पीडीएफ (प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट) के विधायक मुख्यमंत्री को छोड़कर कांग्रेस के अन्य नेताओं की आंख की किरकिरी बने हुए थे।
दुर्गापाल के कांग्रेस में शामिल होने से पार्टी कितनी मजबूत होगी ये बाद में पता चलेगा लेकिन सीएम ने एक मंत्री का हाथ थामकर उसे सुरक्षित कर लिया है।
विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस केतीन विधायकों की संख्या बढ़ने के बाद ही इसकी पटकथा लिखनी शुरू हो गई थी। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने लगातार इस बात पर दबाव बढ़ाया कि पीडीएफ मंत्रियों की छंटनी कर कांग्रेस के वरिष्ठ विधायकों को मौका दिया जाए।
वहीं प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय और उनकी कोर टीम की ओर से भी ऐसे सुर गूंजे कि पीडीएफ मंत्री जहां जीतकर आए हैं वहां कांग्रेस की उपेक्षा हो रही है। विधानसभा चुनाव हारे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी एक स्वर से पीडीएफ विधायकों से मोहभंग की मांग उठाई थी।
पार्टी के हित में कुछ भी कुर्बान
कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी रावत के तर्क से आश्वस्त दिखता है कि सहयोगी मंत्रियों को कांग्रेस में शामिल करने से पार्टी मजबूत होगी।
दरअसल मुख्यमंत्री विधानसभा चुनाव 2017 के पहले यह साफ कर लेना चाहते हैं कि पीडीएफ के कौन-कौन विधायक चुनाव के दौरान भी उनके साथ रहेंगे। कांग्रेस विधानसभा चुनाव के लिए अभी से अधिकतर सीटों पर उम्मीदवारी तय करना चाहती है।
ऐसे में सहयोगी अगर कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं तो पार्टी उन क्षेत्रों में अन्य नेताओं की दावेदारी नहीं स्वीकार करेगी।प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय कहते हैं कि पार्टी नेता बनाती है।
पार्टी के हित में कुछ भी कुर्बान किया जा सकता है। उनका कहना है कि काफी पहले हरीश रावत की बीएसपी, यूकेडी और निर्दलीय विधायकों से भी बात हुई थी। सहयोगी विधायक भी चाहते हैं कि कांग्रेस जल्द कुछ फैसला ले।