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उत्तराखंड: आरक्षित वन क्षेत्रों में खनन को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी 

Sat, 17 Dec 2016 03:00 AM IST
विजेंद्र श्रीवास्तव/अमर उजाला, हल्द्वानी
विजेंद्र श्रीवास्तव/अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Sat, 17 Dec 2016 03:00 AM IST
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mining in private hand in reserve forest area of uttarakhand.
mining

उत्तराखंड सरकार अब प्रदेश में आरक्षित वन क्षेत्रों में भी निजी हाथों में खनन सौंपने की तैयारी में है। रिवर ट्रेनिंग नीति-2016 के नाम पर इस मंशा को अंजाम दिया जा चुका है। मंशा पर सवाल न उठे इसके लिए आपदा का सहारा लिया गया। सूत्रों के अनुसार इस खनन नीति के आने के बाद थोक में आवेदन आना शुरू हो गए हैं।

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तराई पूर्वी वन प्रभाग, रामनगर वन प्रभाग आदि प्रभागों के अधीन आने वाली गौला, कोसी, बौर, निहाल आदि नदियों में खनन के आवेदन किए गए हैं। कुछ जगह सर्वे भी हो गए हैं। नंधौर नदी के अलावा गौला में श्रीलंका टापू में भी खनन कराने की अनुमति मांगी गई है।
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इन जगहों पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के चलते प्रतिबंध के साथ प्रस्ताव की प्रक्रिया चल रही है। इसके अलावा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अथारिटी में केस भी चल रहा है।

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रिवर ट्रेनिंग नीति को बनाया आधार

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आरक्षित वन भूमि के अंतर्गत आने वाली गौला, कोसी, दाबका आदि नदियों में खनन कराने से पहले तमाम नियम, कानून का पालन करना होता है। वन विभाग देहरादून से लेकर दिल्ली तक दौड़भाग करता है, इसके बाद वन निगम के जरिए खनन होता है।

अब शासन ने 30 सितंबर, 2016 को जारी रिवर ट्रेनिंग नीति-2016 के तहत आरक्षित वन क्षेत्रों में खनन कराने का रास्ता खोल दिया है।  इस बाबत जारी शासनादेश के आधार पर सचिव खनन शैलेश बगोली ने सभी संबंधित कार्यालयों को कार्यालय ज्ञाप भेजा है। जो नीति बनी है, उसमें जहां पर खनिज ज्यादा जमा है और उससे भूकटाव, जानमाल का खतरा है, वहां से निजी व्यक्ति, संस्था खनिज निकालने को आवेदन कर सकता है।

इसके लिए संबंधित व्यक्ति को केवल जिला अधिकारी के यहां आवेदन करना होगा।  इसके बाद जिला अधिकारी खनिज मात्रा का आकलन, सत्यापन एक समिति के माध्यम से कराएगा। यह समिति एसडीएम की अध्यक्षता में होगी। समिति में वन महकमा, सिंचाई विभाग और भू वैज्ञानिक को भी शामिल किया गया है।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने लगा रखा है प्रतिबंध

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खनन - फोटो : अमर उजाला

रिवर ट्रेनिंग नीति में आरक्षित वन क्षेत्रों में आने वाली नदियों का कोई उल्लेख नहीं है। इसके बाद धड़ाधड़ आरक्षित वन क्षेत्रों वाले इलाके से भी आवेदन किए जाने की बात कही जा रही है। इसमें नंधौर नदी में खनन कराने की अनुमति मांगी गई है, जहां 10 साल की खनन अनुमति मियाद खत्म होने के बाद केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने रोक लगा रखी है।

नए सिरे से अनुमति के लिए वन निगम के माध्यम से आवेदन किया गया है। इसके अलावा मामला एनजीटी में भी चल रहा है। बताया जाता है कि इसी तरह गौला के श्रीलंका टापू में खनिज निकासी की अनुमति मांगी गई है। इस जगह पर गौला कॉरिडोर होने के कारण केंद्रीय एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्रतिबंध लगाया हुआ है।

यही नहीं गौला को लेकर भी एनजीटी में केस भी चल रहा है। रामनगर वन प्रभाग में निहाल, दाबका नदी में सात जगहों पर खनिज निकासी के लिए आवेदन मांगा गया था। यहां सर्वे भी हो चुका है।

वन विभाग के सामने मुश्किल

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NGT
वन विभाग की मुसीबत यह है कि अगर वह अनुमति देता है, तो एनजीटी से लेकर केंद्रीय एवं पर्यावरण मंत्रालय में नियमों को तोड़ने तक पर जवाब देना पड़ सकता है। अगर आवेदनों पर कोई अड़ंगा लगाते हैं, तो राज्य सरकार के कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है। रामनगर वन प्रभाग की डीएफओ नेहा वर्मा के मुताबिक वन संरक्षण कानूनों के तहत प्रथमदृष्टया अनुमति नहीं दी जा सकती है। बहरहाल, सर्वे कराया जा चुका है। सभी पहलुओं पर विचार करके ही अंतिम फैसला किया जाएगा। 

गौला, कोसी, बौर, निहाल, नंधौर, भाखड़ा में खनन के लिए आवेदन किया गया है। इसके परीक्षण के लिए तहसील, खान विभाग और वन विभाग से रिपोर्ट मांगी गई है। आवश्यक परीक्षण और विभागों की रिपोर्ट के आधार पर खनन कराने का फैसला किया जाएगा।
-दीपक रावत, डीएम नैनीताल
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