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सरकार की वजह से शहीद के माता-पिता बेहाल

Sat, 04 Oct 2014 08:15 AM IST
बिशन सिंह बोहरा / अमर उजाला, देहरादून
बिशन सिंह बोहरा / अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 04 Oct 2014 08:15 AM IST
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martyrs uttarakhand state movement.

उसकी एक आवाज पर तब सैकड़ों लोग जुट जाते थे। वो आज दो, अभी दो... की ललकार देता तो पूरी नेहरू कालोनी से ..उत्तराखंड राज्य दो का नारा लगता था। उसका सपना पूरा हुआ, राज्य मिला जरूर, लेकिन उसके जाने के बाद। अब वो नहीं है तो कोई नहीं आता।

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उसकी आवाज नहीं है तो किसी को हमारी कराह भी सुनाई नहीं देती। उत्तराखंड को 14 साल हो गए, आठ मुख्यमंत्री बन गए। किसी को भी कभी फुर्सत नहीं मिली कि हमारी सुध लेले? हमें कुछ खास या बड़ा नहीं चाहिए, लेकिन हमने अपनी बुढ़ापे की लाठी राज्य को दी, अब इसके खेवनहार हमें सहारा तो दे सकते हैं....??
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रूंधे गले और धीमी आवाज में 72 वर्षीय कुंदन सिंह रावत जब यह कहते हैं तो उनकी आंखें नम हो आती हैं। कुंदन दो अक्तूबर 1994 को रामपुर तिराहा कांड में शहीद हुए राज्य आंदोलनकारी रवींद्र रावत के पिता हैं।
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गुरुवार दोपहर अमर उजाला नेहरू कॉलोनी स्थित कुंदन सिंह के आवास पर पहुंचा तो रावत सोफे पर बैठे अखबार पढ़ते मिले। पास ही रवींद्र की मां मंगली देवी दवा खा रही थीं।

बातचीत शुरू हुई तो सामने दीवार पर टंगी रवींद्र सिंह रावत की तस्वीर की ओर इशारा कर कुंदन बोले, ‘बहुत खुश था उस दिन।

पेंशन के सहारे दंपति की गुजर बसर

martyrs uttarakhand state movement.

आंदोलनकारी नेताओं ने उसे छात्रों की एक बस भरकर लाने का जिम्मा दिया था। बीएससी में पढ़ रहा था तब, सिर्फ 22 साल ही उम्र थी उसकी। लेकिन उसे युवा बहुत मानते थे, तभी तो चंद घंटों में उसने एक बस से भी ज्यादा छात्र दिल्ली जाने के लिए जुटा लिए थे। यहीं, चौराहे से उसे उसकी मां ने टीका लगाकर विदा किया था।

नारे लगाते हुए बस में चढ़ा था।’ (...कुछ पल थमकर...) ‘क्या पता था, वो उसका आखिरी सफर होगा। राज्य लेने निकला था, फिर घर नहीं लौटा। तीन अक्तूबर 1994 के अखबारों से पता चला कि गोली लगने से रवींद्र की मौत हो चुकी है।’

अब कौन देखने वाला
रावत बताते हैं कि रवींद्र तीन संतानों में दूसरे नंबर का था। बड़ी बेटी विजयलक्ष्मी और छोटी बेटी गीता की शादी हो चुकी है। विजयलक्ष्मी दिल्ली में रहती हैं, गीता उत्तराखंड सचिवालय में कार्यरत हैं और कारगी बाईपास पर रहती हैं।

हालांकि, बेटियां अकसर देखभाल के लिए आती रहती हैं, लेकिन उन्हें अपना घर भी तो देखना है। यहां घर में पति-पत्नी ही एक-दूसरे का सहारा हैं। रावत लेखा परीक्षा विभाग से रिटायर्ड हैं और उनकी पेंशन के सहारे दंपति की गुजर बसर चल रही है।

बड़ी मुश्किल है जिंदगी

martyrs uttarakhand state movement.

रावत ने बताया कि वह और उनकी पत्नी अकसर बीमार रहते हैं। कुछ समय पूर्व रावत के शरीर का निचला हिस्सा पैरालाइज्ड हो गया। बहुत इलाज कराया, अब थोड़ा बहुत उठ-बैठ लेते हैं। वहीं, रवींद्र की मां मंगली देवी ब्लड प्रेशर और श्वास रोग से पीड़ित हैं।

रावत बताते हैं कि दोनों के इलाज पर लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं। कुछ समय पहले तो दोनों एक साथ बीमार हो गए तो हालत बेहद खराब हो गई। अब रावत में कुछ सुधार है, लेकिन मंगली की तबीयत अब भी खराब रहती है।

जीओ ही मिला, पेंशन नहीं
रावत वर्ष 2011 में राज्य सरकार की ओर से शहीदों के परिजनों के लिए तीन हजार रुपए मासिक पेंशन का शासनादेश दिखाते हुए कहते हैं कि सरकार ने इसे जारी तो किया, लेकिन आज तक उन्हें एक बार भी पेंशन नहीं मिली।

दोषियों को सजा न मिलने से आहत
कुंदन सिंह रावत रामपुर तिराहा कांड के दोषियों को सजा न मिलने से आहत हैं। कहते हैं, राज्य पाने के लिए जान देने वालों के साथ इससे बड़ा अन्याय और कुछ नहीं हो सकता। रावत खुद दोषियों को सजा दिलाने के लिए वर्षों संघर्षरत रहे।

उन्होंने मानवाधिकार आयोग को लगातार कई पत्र भी भेजे थे। रावत कहते हैं कि सिर्फ मीडिया ही वह माध्यम रहा, जिसने हमेशा शहीदों के परिजनों की आवाज उठाई। बोले, अगर मीडिया न होती तो शायद रवींद्र का शव कभी मिलता ही नहीं। रामपुर में ही कहीं गायब कर दिया जाता।

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