सैनिकों की जंग: वादा भूली सरकार, सालों बाद भी प्राइवेट नौकरी से गुजारा कर रहा शहीद का बेटा
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कारगिल युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले उत्तराखंड के लाल शहीद मातबर सिंह कंडारी के बेटे जयकृत कंडारी प्राइवेट नौकरी से अपने जीवन का गुजारा कर रहे हैं। पिता के शहीद होने के सालों बाद भी जयकृत को नौकरी नहीं मिल पाई है। कारगिल में मातवर सिंह कंडारी की शहादत के बाद सरकार ने बेटे को नौकरी और एक पेट्रोल पंप देने की घोषणा की थी। लेकिन 20 साल बाद भी न पेट्रोल पंप मिला और न ही बेटे को कोई नौकरी।
साल 1999 में शुरू हुए कारगिल युद्ध में देश के जवान मातवर सिंह कंडारी 30 दिसंबर को आतंकवादियों से लोहा लेते हुए कश्मीर में शहीद हो गए थे। इसके बाद तत्कालीन यूपी सरकार की ओर वीर जवान शहीद कंडारी के परिजनों को एक पेट्रोल पंप और बेटे को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी।
उस समय बेटा जयकृत कक्षा दस की पढ़ाई कर रहा था। अब 20 साल बाद भी शहीद कंडारी के बेटे जयकृत कंडारी इन दिनों प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं और दून के कारगी चौक पर किराए के कमरे में रहते हैं। जयकृत ने बताया कि नौकरी के संबंध में कई बार विधायकों और नेताओं से बात की गई। लेकिन नौकरी की समस्या दूर नहीं हो सकी। ऐसे में पेट्रोल पंप की तो बात ही करना बेमानी है।
दादा-दादी ने किया पोते का पालन पोषण
मातबर सिंह कंडारी के शहीद होने के बाद साल 2005 में भी जयकृत की माता मुन्नी देवी कंडारी का भी देहांत हो गया। इसके बाद जयकृत और उनकी दो बहनों का पालन पोषण दादा-दादी ने किया। जयकृत ने बताया कि दादी दादी के बुजुर्ग थे और आर्थिक स्थिति भी कुछ खास ठीक नहीं थी। चाचा के सहयोग से दोनों बहनों की शादी की गई। बड़ी बहन की शादी होने के बाद सैनिक कल्याण बोर्ड की ओर से एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता की गई थी।
बहन ने पढ़ाया जयकृत को
माता और पिता के देहांत के बाद जयकृत की पढ़ाई का जिम्मा बड़ी बहन नीलम न उठाया। जयकृत ने बताया कि की माता-पिता के देहांत के बाद बहन नीलम नौकरी करने के लिए देहरादून आ गई। बहन ने नौकरी कर जयकृत को एक निजी कॉलेज से होटल मैनेजमेंट का कोर्स कराया। अब जयकृत एक होटल में दस हजार रुपये की अस्थायी नौकरी करते हैं। जबकि बहन की शादी होने के बाद बहन अपने परिवार के साथ बेंगलुरू में रहती है।