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नया या पुराना, लोकायुक्त पर फैसला होगा आज
अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 17 Nov 2013 08:58 AM IST
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उत्तराखंड के नए लोकायुक्त बिल में सरकार हर हाल संशोधन करने को तैयार है। जबकि सहयोगी दलों के विधायक वर्तमान बिल को लागू करने का मन बना चुके हैं।
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सरकार को खींच रहे सहयोगी दलों के फ्रंट पीडीएफ ने एकजुट होकर राष्ट्रपति से पारित बिल को ही लागू कर फिर किसी संशोधन की बात कही है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने रविवार को अपने आवास पर अपने व सहयोगी विधायकों की अहम बैठक बुलाई है। सहयोगियों का रुख तय करेगा कि सरकार का संशोधन ड्राफ्ट विधानसभा पहुंचता है कि नहीं।
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शक्तियों में होगी कटौती
सरकार न्यायपालिका को लोकायुक्त के दायरे से बाहर करने का मन बना चुकी है। अधिकारियों पर अंकुश की धाराओं, लोकायुक्त की शक्तियों में कटौती समेत कुछ अन्य संशोधन भी किए जाने हैं। सरकार चाहती है लोकतांत्रिक व्यवस्था के समांतर ऐसी कोई संस्था न खड़ी हो जिसे अधिक अधिकार प्राप्त हों।
विधायी विभाग ने इसका खाका तैयार कर संबंधित लोगों को भेज दिया है। लोकायुक्त बिल में संशोधन को लेकर सरकार ने जमकर होमवर्क किया है। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और अन्य कानूनविदों व विशेषज्ञों से राय लेकर सरकार ने करीब बीस पेज का संशोधन ड्राफ्ट तैयार किया है।
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एक अधिकारी के मुताबिक नए लोकायुक्त बिल के उन प्रावधानों को हल्का किया जा रहा है जिससे ऐसा कतई प्रतीत न हो कि कोई अलग फोर्स खड़ी हो गई जिस पर नियंत्रण करना मुश्किल हो। संविधान के अनुच्छेद 227 में संशोधन के बगैर न्यायाधीशों को इसके दायरे में नहीं लाया जा सकता है।
उसी तरह से अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों के लिए लोकायुक्त की पूरी खंडपीठ में न्यूनतम तीन सदस्यों का समर्थन होना चाहिए। ऐसे ही कुछ सवालों का जवाब संशोधित बिल में होंगे। ड्राफ्ट में सरकार ने भ्रष्टाचार से लड़ने की अपनी मंशा साफ की है। लेकिन लोकायुक्त की कार्यप्रणाली और उसके निरंकुश होने की संभावनाओं पर संशोधन की कैंची चलाई गई है।
सरकार में शामिल मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी वर्तमान बिल में संशोधन के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि पहले राष्ट्रपति से मंजूरी वाले बिल को लागू किया जाना चाहिए। फिर देखना चाहिए कि क्या खामियां हैं। उसके बाद ही कोई संशोधन हो। बीएसपी विधायक भी अपने फ्रंट के फैसले के साथ हैं।
मंत्री सुरेंद्र राकेश का कहना है कि सरकार विसंगतियां दूर कर इसे जस का तस लागू करे। वहीं, मंत्री हरीश चंद दुर्गापाल मुख्यमंत्री के साथ होने वाली बैठक के बाद ही कुछ बोलने की बात कह रहे हैं।
जस का तस लागू हो बिल
सहयोगी दलों के फ्रंट पीडीएफ के कोटे से मंत्री प्रीतम सिंह पंवार ने बताया कि पीडीएफ नेताओं ने बैठक कर वर्तमान बिल को फिलहाल जस का तस लागू करने का फैसला लिया है। उनका कहना है कि हम भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून के पक्ष में है। सरकार चाहती है संशोधन हो तो उसे विधानसभा में लेकर आए। राष्ट्रपति से पारित बिल पर प्रदेश के विधायकों में कोई मतभेद नहीं था सबने मिलकर इसे पारित किया था।
संशोधन प्रक्रिया लंबी
यदि सरकार नए लोकायुक्त बिल में संशोधन करना चाहेगी तो उसके लिए उसी प्रक्रिया से गुजरना होगा जिससे बिल पास कराने के लिए गुजरी थी। पहले विधायी विभाग ड्राफ्ट तैयार करेगा, फिर कैबिनेट की मंजूरी के बाद सदन में पटल पर रखा जाएगा। सदन की मंजूरी के बाद राज्यपाल से अनुमोदन लेकर राष्ट्रपति को भेजा जाएगा।
कानून के विद्यार्थी के नाते हम चाहते हैं भ्रष्टाचार के खिलाफ बनने वाला बिल फुलप्रूफ हो। भावावेश में लिया गया कोई फैसला लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ होगा।
- दिनेश अग्रवाल, खेल मंत्री
निचली अदालतें लोकायुक्त के दायरे में कैसे आ सकती हैं। संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन होगा। निचली अदालतें सीधे हाईकोर्ट के अधीनस्थ काम करती हैं। इस व्यवस्था को कैसे खत्म किया जा सकता है। लोकायुक्त इनवेस्टिंग एजेंसी है। वह कैसे किसी अदालत के विरुद्ध जांच, संस्तुति और कार्रवाई कर सकती है। अगर ऐसी व्यवस्था कोई बनाई जाती है तो यह अदालतों की स्वायत्तता का हनन होगा।
- के.डी. शाही, सेवानिवृत्त न्यायाधीश
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