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Elections 2024: यूपी का जमाना हो या उत्तराखंड बनने का बाद का, राष्ट्रीय दलों की रही धूम, निर्दलीय रहे निर्बल

Tue, 26 Mar 2024 08:59 AM IST
रेनू सकलानी आफताब अजमत, अमर उजाला ब्यूरो , देहरादून
आफताब अजमत, अमर उजाला ब्यूरो , देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 26 Mar 2024 08:59 AM IST
सार

उत्तराखंड राज्य बनने से पहले दो आम व एक उपचुनाव में ही निर्दलीय प्रत्याशी की जीत हुई है। राज्य गठन के बाद से आज तक किसी निर्दलीय को जीत नहीं मिल पाई।

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Lok Sabha elections 2024 Uttarakhand National parties remained in power independents remained weak
उत्तराखंड लोकसभा चुनाव 2024 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

उत्तर प्रदेश का जमाना हो या उत्तराखंड बनने का बाद का। लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय दलों की ही धूम रही है। राज्य गठन से पहले जरूर दो आम चुनाव में एक-एक निर्दलीय और एक उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी जीता है लेकिन राज्य गठन के बाद से आज तक किसी निर्दलीय को लोकसभा चुनाव में जीत नसीब नहीं हुई। ये बात अलग है कि विधानसभा चुनावों में निर्दलीयों का बोलबाला रहा है।

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राज्य गठन से पहले वर्ष 1951 के आम चुनाव में टिहरी लोकसभा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी महारानी साहिबा कमलेंदु मति शाह ने बंपर जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस के कृष्ण सिंह को हराया था। महारानी को इस चुनाव में 50.94 प्रतिशत तो कांग्रेस प्रत्याशी को 40.59 प्रतिशत मत मिले थे। इसके बाद 1967 के आम चुनाव में देहरादून लोकसभा सीट पर निर्दलीय केवाई सिंह ने लगातार तीन बार के सांसद महावीर त्यागी को हराया था। केवाई सिंह को इस चुनाव में 49.83 प्रतिशत जबकि महावीर त्यागी को 36.64 प्रतिशत वोट मिले थे।
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गढ़वाल में बहुगुणा का रहा शानदार प्रदर्शन
इसके बाद 1982 के उपचुनाव में कांग्रेस से बगावत करके निर्दलीय हेमवती नंदन बहुगुणा ने गढ़वाल लोकसभा सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी चंद्र मोहन सिंह नेगी को मात दी थी। कांग्रेस ने चंद्र मोहन सिंह नेगी को बहुगुणा के खिलाफ उतारा। नेगी को इंदिरा के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया। बहुगुणा इस विद्रोह का पहाड़ का एक बड़ा वर्ग कायल था। जब बहुगुणा ने चुनावी सभा की तो इतनी भीड़ जुटी की पांव रखने के लिए जमीन नहीं बची।
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बहुगुणा की जमीनी का ताकत का अंदाजा लगाने के लिए इंदिरा गोपनीय ढंग से देहरादून पहुंची थी और उन्होंने परेड ग्राउंड के एक स्थान पर गुप्त रूप से बहुगुणा का भाषण सुना। इंदिरा ने बहुगुणा को उन्हीं की जमीन पर हराने की ठानी थी। उनकी गढ़वाल में एक दर्जन से अधिक सभाएं कीं। इंदिरा ने तत्कालीन गृह मंत्री जैल सिंह तक को उपचुनाव में भेजा। देहरादून के कांग्रेस भवन में उन्होंने कई दिन तक कैंप किया। सारी ताकत और मशीनरी झोंकने के बावजूद कांग्रेस बहुगुणा से चुनाव हार गई। गढ़वाल में बहुगुणा का शानदार प्रदर्शन रहा।

तीन बाद के सांसद का विजय रथ निर्दलीय ने रोका
लोकसभा में लगातार तीन चुनाव 1951, 1957 और 1962 में सांसद चुने गए महावीर त्यागी का विजय रथ देहरादून लोकसभा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी केवाई सिंह ने रोक दिया था। इस सीट पर कुल चार में से तीन प्रत्याशी निर्दलीय चुनाव लड़े थे। चौथे कांग्रेस से महावीर त्यागी थे। कुल 3,03,933 वोट पड़े थे, जिनमें से निर्दलीय केवाई सिंह को 1,51,465, महावीर त्यागी को 1,11,353 और बाकी निर्दलीय धर्मपाल को 35,134 व निर्दलीय एच सिंह को 5,981 वोट मिले थे।

राज्य गठन के बाद निर्दलीय आए और गए
राज्य गठन के बाद से अब तक चार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। हर चुनाव में निर्दलीयों ने लड़ने का जोश दिखाया लेकिन कोई कमाल नहीं कर पाया। वर्ष 2004 के चुनाव में कुल 54 प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें से 18 निर्दलीय थे। 2009 के चुनाव में 76 प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें 29 निर्दलीय थे। 2014 के चुनाव में 74 प्रत्याशियों में से 27 निर्दलीय थे और 2019 के चुनाव में 52 में से 21 निर्दलीय प्रत्याशी थे। इनमें से ज्यादातर की जमानत जब्त हुई।

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विधानसभा चुनावों का अलग ट्रेंड
लोकसभा चुनावों से इतर उत्तराखंड के पांच विधानसभा चुनावों में अब तक 13 निर्दलीय प्रत्याशी जीत दर्ज करा चुके हैं। वर्ष 2002 के विस चुनाव में तीन, 2007 के चुनाव में तीन, 2012 के चुनाव में तीन, 2017 में दो और 2022 में दो निर्दलीय प्रत्याशी जीतकर आए।

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