गुलदार की दहशत: प्रकृति ने इन्हें मांसाहारी बनाया, घास तो खाएंगे नहीं...पढ़ें क्या कहते हैं शिकारी
अब तक 46 आदमखोर गुलदार को ढेर कर चुके और सात को पिंजड़े में कैद करा चुके शिकारी हुकिल गुलदार के व्यवहार पर बारीकी से नजर रखते हैं।
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राज्य बनने के बाद गुलदार 500 से अधिक लोगों को शिकार बना चुका है, जबकि 1,850 से अधिक लोगों को जख्मी कर चुका है। प्रकृति ने उसे मांसाहारी बनाया है, ऐसे में वह घास तो खाएंगे नहीं। जंगल में जब उसे शिकार नहीं मिलता, तब वह मानव बस्तियों का रुख करता है।
यह कहना है चौपड़ा, पौड़ी के लाइसेंसी शिकारी ज्वॉय हुकिल का। अब तक 46 आदमखोर गुलदार को ढेर कर चुके और सात को पिंजड़े में कैद करा चुके शिकारी हुकिल गुलदार के व्यवहार पर बारीकी से नजर रखते हैं। ज्वॉय की मानें तो उत्तराखंड में गुलदारों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन वन विभाग के पास इनका सही आंकड़ा नहीं है। ऐसे में इंतजाम भी कैसे होंगे।
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कहा, भोजन की कमी इन्हें नरभक्षी बना रही है। उत्तराखंड में पांच वर्ग किमी में पांच से छह गुलदार घूम रहे हैं। इनका मूवमेंट इंसानी बस्तियों के आसपास है। जंगल में भोजन की कमी के कारण 80 प्रतिशत गुलदार पालतू पशुओं पर निर्भर हैं। इन्हें गोली मारना स्थायी समाधान नहीं है, लेकिन समस्या के समाधान के लिए शोध के साथ दीर्घकालीन योजना पर काम करना जरूरी है। ज्वॉय कहते हैं, गुलदार इंसान से बेहतर शिकारी है, केवल बंदूक का फर्क है। हमारे पास बंदूक होती है और उसके पास नहीं।
जब हम गोली चलाते हैं, चोट हमारे दिल पर भी लगती है
ज्वॉय कहते हैं, जबकि किसी नरभक्षी को अपनी गोली का निशाना बनाते हैं, उन्हें भी दर्द होता है, लेकिन यह प्रकृति का दस्तूर है, यहां कई बार इंसान को भी गलती की सजा मौत के रूप में दी जाती है।
शिकारियों की भूमिका अहम है
ज्वॉय के अनुसार, उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में लाइसेंसी शिकारी अहम भूमिका निभा रहे हैं। यदि वह शिकार चुनकर आदमखोर को न मारें तो लोग गुस्से में दूसरे निर्दोष वन्य प्राणी को शिकार बना सकते हैं। एक लाइसेंसी शिकारी पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही गोली चलाता है।
बाघ और गुलदार के लिए गाइड लाइन अलग हो : लखपत सिंह
अपनी बंदूक से 53 आदमखोर गुलदार और दो बाघों को मौत के घाट उतारने वाले उत्तराखंड के मशहूर शिकारी लखपत सिंह रावत की मानें तो बाघों और गुलदारों के लिए अलग-अलग गाइडलाइन जारी की जानी चाहिए। दोनों वन्यजीवों का रहन-सहन, व्यवहार और शिकार करने का तरीका अलग है।
बीते कुछ सालों में दोनों वन्यजीवों के व्यवहार में अंतर आया है। अब गुलदार झुंड में भी शिकार कर रहे हैं, पहले ऐसा नहीं होता था। गैरसैंण के ग्वाड़ गांव के रहने वाले लखपत वर्तमान में शिक्षा विभाग में बीआरसी के पद पर कार्यरत हैं। मार्च 2024 में वह रिटायर हो जाएंगे। उन्होंने अब तक कई आपरेशन को अंजाम दिया है। गोली का खर्च भी वह अपनी जेब से उठाते हैं।
बेटा अजय रावत भी पिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शिकारी बनने की राह पर है। लखपत बताते हैं, उन्होंने वर्ष 2009 में 12 गुलदार मारे। वर्ल्ड रिकार्ड के तौर पर दर्ज कराने के लिए वह प्रयासरत हैं। उन्होंने आदमखोर को मारने के लिए पहली बार वर्ष 2002 में बंदूक उठाई थी। तब उन्होंने 12 बच्चों को मौत के घाट उतारने वाले एक गुलदार को आठ माह की मशक्कत के बाद मारा था। लखपत बताते हैं, गुलदार को गोली का शिकार बनाने के दौरान वह खुद कई बार उसके हमले में बाल-बाल बचे हैं। ऐसा ही एक किस्सा बताते हुए वह कहते हैं, गजा में हम आदमखोर की तलाश में घात लगाकर बैठे थे। तभी उसने पीछे से उन पर हमला कर दिया। उन्होंने राइफल उल्टी कर गोली चला दी और गुलदार ढेर हो गया।
लखपत कहते हैं, गुलदार को मारना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि वन विभाग उन्हें ट्रेंकुलाइज गन दे तो वह जिंदा भी पकड़ सकते हैं, लेकिन उन्हें वन विभाग का सहयोग नहीं मिलता है। आज उत्तराखंड में ऐसे शिकारी वन कर्मियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं, जिन्हें उत्तराखंड का कोई अनुभव नहीं है।