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जिंदगी की 'जंग' लड़ रहे हैं गुलदार
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 25 Nov 2014 02:34 PM IST
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जंगल से निकल गुलदार आबादी में उत्पात मचा रहे हैं। कहीं-कहीं ये आदमखोर हो रहे हैं। दूसरी ओर इंसानों से ज्यादा समझदारी की उम्मीद होती है पर ऐसा दिख नहीं रहा है। सरकार भी इनके लिए कुछ खास नहीं कर रही है।
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गढ़वाल मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों में गुलदारों की बहुतायत है पर वहां एक भी रेस्क्यू सेंटर नहीं है। हरिद्वार और अल्मोड़ा में सेंटर तो बने हैं पर इनमें न कोई डाक्टर है और न जरूरी सुविधाएं हैं। बाड़ों में इतनी भी जगह नहीं कि वे टहल सकें। लिहाजा रेस्क्यू सेंटर ही उनके लिए मौत का कुआं साबित हो जाता है।
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आदमखोर होने पर मार देता है वन विभाग
गढ़वाल मंडल के पर्वतीय क्षेत्र के वन विभाग के अधिकारी कहते हैं कि यहां के आदमखोर गुलदारों को मारना उनकी मजबूरी है। कारण यह है कि इस इलाके में गुलदारों के संरक्षण के लिए अब तक रेस्क्यू सेंटर नहीं बन पाया है।
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मंडल में आदमखोर गुलदारों के लिए एकमात्र रेस्क्यू सेंटर हरिद्वार में है। वन विभाग की मानें तो गुलदार को ट्रैंकुलाइज कर हरिद्वार तक पहुंचाना संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में मजबूरन आदमखोर गुलदार को मारना पड़ता है।
यदि कोई गुलदार पिंजरे में फंसता भी है तो उसे रेस्क्यू सेंटर में रखवाने में काफी दिक्कत आती है। वहां क्षमता से अधिक गुलदार पहले से मौजूद रहते हैं। ऐसे में सेंटर के अधिकारी नए गुलदार को लेने में काफी ना-नुकर करते हैं।
गुलदार बने गोली के शिकार
गढ़वाल वन प्रभाग में इस वर्ष वन विभाग ने तीन गुलदारों को आदमखोर घोषित किया है। इनमें से दो गुलदार शिकारियों की गोली से ढेर हो चुके हैं। एक गुलदार वन विभाग के पिंजरे में फंस चुका है।
देहरादून में सेंटर खोलने की कार्रवाई हो रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में भी रेस्क्यू सेंटर खोलने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिए प्रयास चल रहे हैं।
- डॉ. डीबीएस खाती, मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक, उत्तराखंड
सेंटर में भी रेस्क्यू नहीं
आबादी वाले क्षेत्रों में गुलदारों की दखल बढ़ रही है। हरिद्वार में सड़क से लेकर रेस्क्यू सेंटर तक में गुलदार दम तोड़ रहे हैं। इस साल रेस्क्यू सेंटर लाए गए पांच घायल में से तीन गुलदारों ने दम तोड़ दिया क्योंकि इस सेंटर में इलाज के लिए डॉक्टर ही नहीं है।
वर्ष 2011 में राजाजी नेशनल पार्क के चिड़ियापुर रेंज में रेस्क्यू सेंटर बनाया गया था। तीन वर्ष बाद भी वन विभाग डॉक्टर व फार्मासिस्ट के पद सृजित करने का प्रस्ताव नहीं भेज पाया है। यहां घायल गुलदार आने के बाद पशु अस्पताल से डॉक्टर को बुलाया जाता है। कई बार डाक्टर समय पर नहीं पहुंच पाते। इलाज में देरी होने से गुलदार की जान पर बन आती है।
आठ माह से सजा भुगत रही है मादा
अल्मोड़ा में एनटीडी के मृग विहार परिसर में स्थित वन्य जीवों के लिए बने रेस्क्यू सेंटर के हालात ठीक नहीं हैं। बीमार जानवरों को रखने के लिए रेस्क्यू सेंटर में पर्याप्त बाडे़ नहीं हैं।
इस कारण उपचार को लाई गई मादा गुलदार आठ महीने से तीन गुणा चार फीट के पिंजरे में सजा भुगत रही है। स्वस्थ हो चुकी इस मादा को जल्द अन्य बाड़े में शिफ्ट नहीं किया तो उसकी जान को खतरा हो सकता है।
नियमानुसार उपचाराधीन जानवरों को सात से अधिकतम 14 दिन तक ही बाड़े में रखा जा सकता है। इसके बाद उन्हें जंगलों में छोड़ दिया जाना चाहिए, अथवा उन्हें अन्यत्र बाड़ोंमें रखा जाता है। संकरे बाड़े में इस गुलदार के घूमने तक की जगह नहीं है।
इससे यह आजाद होने के लिए दिन-रात दहाडे़ मारती रहती है। हालांकि रेस्क्यू सेंटर में एक बड़ा बाड़ा भी है पर इसमें पहले से तीन गुलदार हैं। इन्हें भी बारी से अलग-अलग दिन घूमने को मिलता है।
रेस्क्यू सेंटर के अस्पताल में डाक्टर समेत अन्य पदों पर तैनाती करने के लिए समय-समय पर शासन को प्रस्ताव भेजे जाते हैं। अनुमति के बाद इनकी तैनाती होगी। बाड़ा निर्माण के लिए सेंटर जू अथॉरिटी से 25 लाख रुपए मिले हैं। मादा गुलदार को आठ माह से संकरे बाड़े में रखा जाना मजबूरी है।
- अमरीश कुमार, उप प्रभागीय वनाधिकारी, सिविल सोयम वन प्रभाग अल्मोड़ा