तो चुनाव बाद भाजपा में छिड़ेगी वरिष्ठता की जंग!
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तो क्या भाजपा में वरिष्ठता का मुद्दा चुनाव बाद एक बार फिर उभरेगा? भारतीय राजनीति के पुरोधा पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के पिथौरागढ़ दौरे में अपनी वरिष्ठता पर जोर देना कहीं न कहीं इस बात की ओर संकेत कर रहा है।
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एक तरह से पूर्व में गाहे-बगाहे अपनी वरिष्ठता की अनदेखी होने का उनका दर्द यहां भी झलका। सभा में जिस तरह से वह चिंतन की मुद्रा में दिखे उसको लेकर कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। उनकी यह चिंता या चिंतन अपने लिए था या फिर पार्टी के लिए।
खुद को बताया सबसे वरिष्ठ
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के देवसिंह मैदान में शुक्रवार को दोपहर मंच संचालक पूर्व मंत्री प्रकाश पंत ने आडवाणी को बोलने के लिए आमंत्रित किया।
आडवाणी पहले तो करीब 40 सेकेंड तक चिंतन में डूबे रहे फिर उन्होंने बगैर किसी औपचारिकता के अपनी वरिष्ठता पर बोलना शुरू कर दिया।
माइक संभालते ही कहा कि 15वीं लोकसभा में संसद में वह और प्रणव मुखर्जी दो ही वरिष्ठतम सदस्य हैं। प्रणव दा के राष्ट्रपति बनने के बाद संसद में उन्हें ही वरिष्ठतम माना जाता है।
इशारों में बता गए अपना योगदान
आडवाणी यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा कि आजादी के समय उनकी उम्र 20 साल थी। 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 2014 के 16वें आम चुनाव में उनकी भागीदारी रही है।
भाजपा के भीष्म पितामह ने कहा कि 1951 में पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ का गठन करने की बात छेड़कर पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं के दिलों को छूने की कोशिश की।
भारतीय राजनीति और संसद में वरिष्ठता का हवाला देकर कहीं न कहीं आडवाणी पार्टी में अपने योगदान की ओर इशारा कर गए।
ईमानदारी बरतने की नसीहत तो नहीं
1951 में जनसंघ और 1980 में स्थापित भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक जीवन बेबाक रहा है।
आडवाणी के भाषणों की शुरुआत अपनी वरिष्ठता से करने के साथ ही सभा में एक और बात चर्चा में रही। उन्होंने मंच से कई बार ईमानदारी की दुहाई दी।
कहीं यह आडवाणी की पार्टी को स्वयं के प्रति ईमानदारी बरतने की नसीहत तो नहीं थी। इस बात की चर्चा मीडिया गैलरी के साथ ही आडवाणी का भाषण सुनने आए लोगों में भी रही।