फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   laughing tree in kaladhungi

OMG: इस पेड़ को लगती है गुदगुदी

Fri, 11 Apr 2014 09:16 AM IST
प्रकाश नैनवाल/अमर उजाला, कालाढूंगी
प्रकाश नैनवाल/अमर उजाला, कालाढूंगी Updated Fri, 11 Apr 2014 09:16 AM IST
विज्ञापन
laughing tree in kaladhungi

उत्तराखंड के कालाढूंगी के जंगल में ऐसे दरख्त का आप दीदार कर सकते हैं, जिसके तने में अंगुलियां रगड़ें तो उसकी शाखाएं कांपना शुरू कर देती हैं। यह जानकर भले ही आपको हैरानी हो, लेकिन यह सच है।

विज्ञापन


कालाढूंगी के जंगल में दो और रामनगर के क्यारी जंगल में कांपने वाला वृक्ष मौजूद है। स्थानीय लोग इसे हंसने वाला पेड़ कहते हैं। जंगल विभाग को इस वृक्ष की बहुत जानकारी नहीं है। हालांकि मुख्य वन संरक्षण अनुसंधान एसके सिंह का कहना है कि ऐसा होता है।
विज्ञापन


पिछले चार साल से कालाढूंगी के दो वृक्षों को कार्बेट ग्राम विकास समिति ने पर्यटन से जोड़ा है। पर्यटकों को घने जंगल में कंपन वाले यह पेड़ दिखाने के लिए बकायदा समिति के गाइड जाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


कालाढूंगी में इसे थनेला के नाम से जाना जाता है। जबकि इसका वानस्पतिक नाम ‘रेंडिया डूमिटोरम’ है। रूबीएसी कुल का यह सदस्य करीब 300 से 1300 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है।

दिसंबर से जनवरी तक का समय पेड़ों में फल आने का रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे मेनफल, मिंदा, राधा और मदनफल का भी नाम दिया गया है।

हंसने वाला पेड़ कहते हैं स्थानीय ‌न‌िवासी

laughing tree in kaladhungi

कालाढूंगी से कोटाबाग वाली रोड में मुड़ने पर करीब चार किलोमीटर आगे जाने के बाद घने जंगल में यह दोनों वृक्ष आमने-सामने मौजूद हैं। इस समय इनकी पत्तियां गिरी हुई हैं। कार्बेट ग्राम विकास समिति के अध्यक्ष राजकुमार पांडे बताते हैं कि स्थानीय लोग इसे हंसने वाला पेड़ भी कहते हैं।

उनका कहना है कि इस जंगल में सिर्फ यही दो पेड़ बचे हैं, जिनका अस्तित्व संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। दोनों पेड़ों के तने काफी कमजोर हो गए हैं।

कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के वनस्पति विज्ञान के प्राध्यापक प्रो. ललित तिवारी बताते हैं कि इस पेड़ की शाखाएं कंटीली होती हैं और आमतौर पर यह हिमाचल प्रदेश में पाया जाता है। उनका कहना है कि पेड़ में कंपन होना शोध का विषय है। प्रभागीय वनाधिकारी डा. पराग मधुकर धकाते का कहना है कि जंगलात के रिकार्ड में इस वृक्ष का जिक्र नहीं है।

इस पर रिसर्च किया जाएगा। वह मानते हैं कि पेड़ों में कंपन की एक वजह उनकी ब्रांचों और तनों की ‘नसों’ का आपस में मिलना भी हो सकता है। क्योंकि ऐसी स्थित में अगर तने पर स्पर्श करो तो पेड़ की शाखाओं में कंपन पैदा होने लगती है। ऐसे पेड़ दुर्लभ होते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed