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लखियाभूत के मैदान में आते ही रोमांचित हुए लोग, जानिए क्या है इस पर्व का महत्व

Sat, 02 Sep 2017 12:08 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Sat, 02 Sep 2017 12:08 PM IST
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lakhiyabhoot is part of traditional festival of kumaun
kumaun festival

आस्था और रोमांच के बीच सोरघाटी (पिथौरागढ़) के कुमौड़ गांव का प्रसिद्ध हिलजात्रा उत्सव शुक्रवार को संपन्न हो गया। रस्सियों से जकडे़ लखियाभूत के हिलजात्रा मैदान में पहुंचते ही वहां रोंगटे खड़े करने वाला दृश्य पैदा हो गया। करीब 25 हजार लोग इस अद्भुत लोक परंपरा के साक्षी बने। वित्त मंत्री प्रकाश पंत इस आयोजन में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। पंत ने कहा कि इस लोक परंपरा को जीवित रखने के लिए लोगों को सजग रहना होगा। 

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हिलजात्रा पर्व की तैयारी कुमौड़ गांव में एक सप्ताह पहले से शुरू हो गई थी। शुक्रवार दोपहर बाद पिथौरागढ़ नगर के लोगों का रुख कुमौड़ गांव की ओर था। देखते ही देखते कुमौड़ का ऐतिहासिक मैदान लोगों की भीड़ से खचाखच भर गया। लोग घरों की छतों पर जमा हो गए। शाम करीब 6.15 बजे से उत्सव की शुरुआत हुई। कुमौड़ के ऐतिहासिक कोट (किले) से सबसे पहले रोपाई लगाने वाली महिलाओं का दल मैदान में उतरा। उसके बाद गलिया बल्द (आलसी बैल) की जोड़ी लाई गई। 
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शाम 6.30 बजे ढोल-नगाड़ों के बीच जैसे ही लखियाभूत को मैदान में लाया गया तो लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। बच्चे इधर-उधर भागने की कोशिश करने लगे। लखियाभूत को नियंत्रित करने के लिए बड़ी-बड़ी रस्सियों का सहारा लिया गया। लखियाभूत की भूमिका इस बार यशवंत महर ने निभाई। गल्या बल्द (आलसी बैल) की जोड़ी में इस बार समीर दिगारी, अभिषेक महर, सूरज महर और कोनाल महर थे।

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यह मुखौटा महर राजपूत नेपाल से जीतकर लाए थे

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kumaun festival

सभी ने विशेष प्रकार का मुखौटे पहने थे। बताया जाता है कि यह मुखौटा महर राजपूतों के वंशज नेपाल से जीतकर लाए थे। मान्यता है कि लखियाभूत जितना आक्रामक है, प्रसन्न होने पर उतना ही फलदायी भी होता है। हजारों की संख्या में मौजूद महिलाओं और पुरुषों ने लखियाभूत का आशीर्वाद प्राप्त किया।

विश्वास है कि इस तरह की उपासना और आयोजन से लखियाभूत प्रसन्न हो जाते हैं। इससे गांव और इलाके में किसी प्रकार की विपदा नहीं आती, फसल बेहतर होती है, सूखे और प्राकृतिक आपदा का प्रकोप नहीं होता है। महिलाओं ने लखियाभूत पर फूल और अक्षत बरसाए।   

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