हिमालय के इस फल से कम होता है डेंगू का प्रकोप
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विदेशों में काफी लोकप्रिय हिमायली मूल का फल डेंगू के इलाज में कारगर साबित हुआ है। हिमालयी रेंज के अलग-अलग ऊंचाई वाले जलवायु क्षेत्रों के लिहाज से कीवी की प्रजातियों की पैदावार की जाएगी।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन उत्तराखंड काउंसिल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी ने देश में पहली बार कीवी की प्रजातियों को वर्गीकृत करके टिश्यू कल्चर की नई तकनीक से यह पौध तैयार की है। उत्तराखंड के कई जिलों में इसके क्लस्टर बना दिए गए हैं।
काउंसिल ने सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीबीआरआई) रुड़की के सहयोग से कीवी की बेल के चढ़ने के लिए नए तरीके का टी-बार डिजाइन किया है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में कीवी की बेल लगाने में दिक्कत नहीं आएगी।
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने और हिमालयी क्षेत्र में इको सिस्टम सर्विसेज को बढ़ावा देने की गरज से विज्ञान एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने कीवी की फसलों की पैदावार के लिए नए सिरे से शुरुआत की है। हिमालयी (इंडो-तिब्बत) मूल के अंतरराष्ट्रीय महत्व के इस फल को न्यूजीलैंड, इटली, जापान, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन आदि देशों में लोकप्रिय होने के 110 साल बाद प्रदेश में फिर तवज्जो दी गई है।
डेंगू के दौरान खूब रही कीवी मांग
खास बात यह है कि काउंसिल ने कीवी को लगाने के लिए पूरी गणित तैयार कर दी है, यानी चार पौधों (फीमेल) के बीच में एक कीवी (मेल) लगाया जाएगा। यह गणित बिगड़ी तो कीवी फल नहीं देगा। प्रदेश के चमोली, चंपावत, उत्तरकाशी, नैनीताल आदि जिलों में इसके क्लस्टर बना दिए गए हैं।
इन जिलों के दो सौ से अधिक किसानों ने अपनी भूमि में कीवी पैदा करने के लिए आवेदन पत्र जमा कर दिए हैं। नई तकनीक से तैयार पहले चरण की चार सौ पौधों की खेप लेने के लिए मारामारी है। काउंसिल के निदेशक डा. केपी सिंह ने बताया कि कीवी की एलोजन, हेवार्ड और मोंटी प्रजाति को एक हजार से 2000 मीटर ऊंचाई के अलग-अलग जोन में लगाया जाएगा।
15 जनवरी से पौध लगनी शुरू हो जाएगी। विज्ञानियों का कहना है कि कीवी का फल स्वादिष्ट होने के साथ डेंगू मरीजों के लिए बहुत मुफीद है। यह प्लेटलेट्स काउंट बहुत तेजी से बढ़ाता है।
टिश्यू कल्चर की नई तकनीक से जो प्रजातियां लगाई जाएंगी, वे शुद्ध और रोग रहित रहेंगी। कीवी इंडो-तिब्बत मूल का पौधा है, लेकिन विदेशों में इस पर अधिक काम हुआ था। यह 1905 में न्यूजीलैंड गया। वहां इस पर 35 साल शोध हुआ। यह फल डेंगू में फायदेमंद है। दिल्ली में डेंगू के प्रकोप के दौरान इसकी बहुत मांग रही।
- दीपक कुमार, सचिव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग