केदारनाथ की राह से जुदा नहीं हुए आपदा के कांटे
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अब जबकि करीब पखवाड़ा भर बाकी है केदारनाथ धाम की यात्रा को, हर किसी की सांसें अटकी हैं, कैसे होगा इतना सारा काम। कैसे और कितने दूर हो सकेंगे केदारधाम की राह के कांटे।
कितना सुगम होगा रास्ता और क्या लोग आएंगे, कितने लोग आएंगे। ये शूलनुमा सवाल हर किसी के जेहन में तारी हैं, चाहे वो सरकार का नुमाइंदा हो या फिर यात्रा मार्ग के छोटे-मोटे दुकानदार।
यूं तो चुनौतियों के मोर्चे पर नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) के प्रिंसिपल कर्नल कोठियाल की फौज पूरी मुस्तैदी से डटी है और एक हद तक आश्वस्त भी करती है, लेकिन कुदरत ने जो मोर्चा खोल दिया है, उससे चुनौतियां और तेजतर्रार हो गई हैं।
शाम को हटाते हैं बर्फ, सुबह फिर उतनी
चैत्र मास में असाढ़-सावन जैसा मौसम केदारधाम में पुनर्निर्माण के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा है। शाम को बर्फ हटाई जाती है तो सुबह-सुबह फिर फट पड़ती है।
केदारनाथ को आसपास की इमारतों से अतिक्रमणमुक्त करना भी लाजिमी और बड़ी चुनौती है। पंडों-पुरोहितों के लिए यूं तो वहीं आवास देने की सरकारी पेशकश है लेकिन अभी इस पर ना-नुकुर के बीच सहमति-असहमति बन-बिगड़ रही है।
2013 की महाआपदा से छिन्न-भिन्न हुए धाम के री-डिजाइन पर अमल परंपरा और वैज्ञानिकता के बीच द्वंद्व से बेहद संवेदनशील मसला बन चुका है। सरकार ने जिस मॉडल धाम की कल्पना की है उसमें मंदिर के चारों और कोई भी निर्माण नहीं है। केदारनाथ में काम कर रही पुनर्निर्माण की टीम भी इसी कोशिश में जुटी हुई है।
कर्नल कोठियाल को खुलकर काम करने का मौका
एक तसल्ली की बात यह है कि जहां सरकारी कार्यों में ब्यूरोक्रेसी की अड़ंगेबाजी की तमाम मिसालें सूबे में आए दिन सामने आती हैं, वहीं केदारनाथ के पुनर्निर्माण में कर्नल कोठियाल को खुले हाथ मिले हुए हैं और इससे काम कुछ आसान हो गया है। उन्हें छोटी-छोटी बातों की मंजूरी के लिए सरकारी गलियारों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं।
भले ही भोले-भंडारी मिशनरी मोड में लगे कामकाजियों के हौसले की परीक्षा लेने में कोई कोर-कसर बाकी न रख रहे हों, लेकिन ऐसे उदाहरण भी भरपूर हैं कि भक्तों की जिद की आगे वे झुकते भी हैं।