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आपदाः दो साल बाद भी हरे हैं मासूमों के जख्म

Tue, 16 Jun 2015 12:05 PM IST
चंद्रशेखर जोशी/ अमर उजाल, चंपावत
चंद्रशेखर जोशी/ अमर उजाल, चंपावत Updated Tue, 16 Jun 2015 12:05 PM IST
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kedarnath disaster story.

नेपाली बच्चों ने केदार घाटी को कभी देखा नहीं है। बस इसका नाम सुना भर है, लेकिन यह घाटी उनके जेहन से कभी निकलती नहीं।

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2013 में पैसा कमाने के लिए केदार घाटी गए माता-पिता का आपदा के बाद पता नहीं चला। तबसे ये बच्चे उस आपदा के जख्म झेल रहे हैं। अपने मामा के घर में दिन गुजार रहे इन बच्चों को अब तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली।

रोलपा (नेपाल) के खड़क सिंह (35) और उनकी पत्नी मधु देवी (32) मई, 2013 में काम के लिए एक अन्य साथी के साथ काजुला (केदार घाटी) गए। सीजन में कुछ वर्षों से पैसा कमाने के लिए वे केदार घाटी जाते थे। 16-17 जून को आई आपदा के बाद से इन तीनों का कोई पता नहीं। मुस्कान (10), सुनील (13) और कमल थापा (15)।
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ये तीनों बच्चे चंपावत में अपने मामा करन सिंह, मामी अनीता और मौसी कमला के साथ रह रहे हैं। करन बताते हैं कि आखिरी बार 13 जून 2013 को उनकी बात हुई थी। महेंद्र नगर, नेपाल निवासी करन छोटे होटल से जीविका चलाते हैं।
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वह जैसे-तैसे बच्चों को स्कूल भेजने के साथ ही परवरिश भी कर रहे हैं। लेकिन इन बच्चों को कोई सरकारी मदद नहीं मिली। स्वयंसेवी संगठन भी मदद को आगे नहीं बढ़े। एआरटीओ विमल पांडेय ने जरूर इनकी कुछ मदद की, लेकिन इस माह उनका भी तबादला हो गया। ऐसे में मुश्किल और बढ़ गई है।

नहीं मिल सका मृत्यु प्रमाणपत्र
केदार घाटी में आई आपदा में लापता नेपाली दंपति के बारे में जिला प्रशासन ने रुद्रप्रयाग के डीएम को पिछले साल पत्र भेजा था। नेपाली दंपति और उनके साथ गए तीसरे व्यक्ति के बारे में जानकारी मांगते हुए मृत्यु प्रमाणपत्र की कार्यवाही के लिए भी आग्रह किया गया था। मगर अब तक ये प्रमाणपत्र भी नहीं मिल सका है।


आपदा राहत अधिनियम में विदेशी नागरिक को सहायता देने का प्रावधान नहीं है। लापता, मृत तमाम नेपाली नागरिकों के परिजनों को राहत देने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को भेजा है। दिशा-निर्देश मिलने के बाद ही मदद पर कोई फैसला लिया जा सकेगा।
- अशोक जोशी, एसडीएम, चंपावत

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