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केदारनाथ त्रासदी: 15 जून को शुरू हो गई थी तेज बारिश, फिर...

Thu, 15 Jun 2017 06:34 PM IST
विनय बहुगुणा/ अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
विनय बहुगुणा/ अमर उजाला, रुद्रप्रयाग Updated Thu, 15 Jun 2017 06:34 PM IST
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kedarnath disaster Slow relief
kedarnath

15 जून 2013 को तेज बारिश शुरू हो गई थी, फिर आई थी वो खौफनाक तारीख। 16 जून को केदारनाथ त्रासदी के चार साल पूरे हो जाएंगे। ये ही वो वक्त था, जब प्रकृति ने उत्तराखंड पर जमकर कहर बरपाया था। 

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वर्ष 1998 में राउलेंक में भूस्खलन, 2012 में ऊखीमठ आपदा और 2013 की केदारनाथ आपदा के अलावा पिछले चार दशक से क्षेत्र के कई गांव भूस्खलन व भू-धंसाव के कारण प्रभावित हुए हैं। जून 2013 के बाद राजस्व विभाग, वन विभाग, ग्राम्य विभाग और भू-गर्भ विशेषज्ञों के निरीक्षण और सर्वेक्षण के बाद तैयार की गई रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन ने गांवों का चिन्हिकरण कर विस्थापित होने वाले गांवों की सूची तैयार की।
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सूची के आधार तीनों तहसील में 23 गांव के 472 परिवार चयनित किए गए। विस्थापित होने वाले परिवारों में 411 के पास अपनी अलग सुरक्षित भूमि उपलब्ध है, जबकि 61 परिवारों को राज्य सरकार द्वारा चयनित 46 नाली भूमि पर बसाया जाना है। विस्थापन के लिए प्रशासन द्वारा प्रति परिवार 3.5 लाख रुपये के हिसाब से शासन को 16 करोड़ 52 लाख का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन पिछले तीन वर्ष से विस्थापन की प्रक्रिया सर्वेक्षण और कागजों से आगे नहीं बढ़ पाई है। हालात यह हैं कि जखोली ब्लॉक का पांजणा गांव भूस्खलन व भूधंसाव से निरंतर जर्जर हो रहा है। 
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सेमी-भैंसारी गांव के अस्तित्व पर मंदाकिनी नदी का बहाव कभी भी खतरा बन सकता है। यहां के ग्रामीण हल्की बारिश होने पर भी रतजगा कर रहे हैं। 

ग्राम प्रधान त्रिलोक सिंह, कुंवरी बत्र्वाल आदि का कहना है कि भूस्खलन व भू-धंसाव से आवासीय घरों की स्थिति निरंतर बिगड़ रही है, कभी भी अनहोनी हो सकती है। पुर्नवास को लेकर ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। प्रभावित गांवों की फाइलें रुद्रप्रयाग से देहरादून की दौड़ लगाकर वापस लौट रही हैं।

पांडुकेश्वर में अब भी जोखिम कम नहीं

kedarnath disaster Slow relief
pandukeshwar

आपदा के चार साल गुजर जाने के बाद भी पांडुकेश्वर में अलकनंदा किनारे बाढ़ सुरक्षा कार्य अधूरे पड़े हैं। भूस्खलन से जर्जर कई आवासीय भवन अब भी हवा में झूल रहे हैं। पांडुकेश्वर में अलकनंदा साइट बाढ़ सुरक्षा कार्य न होने से नदी का रुख गांव की ओर है। हर वर्ष इधर बरसात शुरू होती है, तो उधर लोगों के दिलों की धड़कने आपदा की आशंका में तेज हो जाती हैं।

इन स्थितियों के बीच, आपदा की मार झेलने वालों में सरकारी सिस्टम के प्रति नाराजगी है। आपदा प्रभावित अंशुमान भंडारी की सुनिए। बकौल भंडारी-जून 2013 की आपदा में उनका लॉज भूस्खलन की चपेट में आ गया था। आज तक लॉज के नीचे से सुरक्षा दीवार का निर्माण कार्य नहीं हुआ है। आपदा प्रभावित दीवान मेहता, प्रेम भट्ट और मोहन लाल की पीड़ा भी मिलती जुलती है। उनका कहना है कि अलकनंदा साइट बाढ़ सुरक्षा कार्य अभी तक नहीं हुए हैं, जिससे उनके घरों को खतरा बना हुआ है।

आपदा प्रभावितों का कहना है कि वर्ष 2016 में गोविंदघाट पहुंचे तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी बाढ़ सुरक्षा कार्य शुरू कराने को लेकर ज्ञापन सौंपा था। बाढ़ सुरक्षा कार्य सिंचाई विभाग को करना था, लेकिन अब तक कार्य शुरू नहीं हुए हैं। 

इधर, जिला आपदा अधिकारी नंद किशोर जोशी का कहना है कि पांडुकेश्वर और गोविंदघाट में आपदा प्रभावितों को नियमानुसार मुआवजा दिया जा चुका है। पांडुकेश्वर में बाढ़ सुरक्षा कार्य के लिए सिंचाई विभाग को बजट मिला था। यहां अलकनंदा साइट बाढ़ सुरक्षा कार्य हुए भी हैं। यदि दोबारा बजट मिला तो पांडुकेश्वर से गोविंदघाट तक बाढ़ सुरक्षा कार्य किए जाएंगे।

न पैदल मार्ग सुरक्षित, न नए पड़ाव

kedarnath disaster Slow relief
kedarnath foot route - फोटो : amarujala

आपदा को चार वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। केदारपुरी और उसके पैदल मार्ग पर भूस्खलन व भू-कटाव को रोकने के इंतजाम की मत पूछिए। अभी तक कार्ययोजना भी तैयार नहीं की जा सकी है। नए मार्ग पर बसे पड़ावों के नीचे मंदाकिनी के तेज बहाव से निरंतर कटाव हो रहा है। इसके चलते रामबाड़ा से बेस कैंप तक मार्ग बेहद संवेदनशील बन गया है, लेकिन पड़ावों की सुरक्षा और यहां भूमि को बचाने के लिए कोई ऐसे कदम नहीं उठे हैं, जो आश्वस्त करते हों।

16/17 जून 2013 को केदारनाथ में आए जलप्रलय से केदारपुरी और मंदाकिनी नदी के किनारे दायीं तरफ पैदल मार्ग पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। तब से यहां भूस्खलन बढ़ा है। वर्ष 2014 में केदारनाथ पुनर्निर्माण के तहत मंदाकिनी नदी के बायीं तरफ से रामबाड़ा से केदारनाथ तक नए अलाइनमेंट पर पैदल मार्ग का निर्माण किया गया है।

इस मार्ग पर छोटी लिनचोली, बड़ी लिनचोली, छानी चट्टी और बेस कैंप में नए पड़ाव/बाजार के रूप में विकसित किया जा रहा है, लेकिन पड़ावों की सुरक्षा को लेकर ठोस इंतजाम नहीं किए गए हैं। जिस रास्ते पर ये पड़ाव हैं, वहां नीचे बह रही मंदाकिनी का तेज प्रवाह भू-कटाव कर रहा है। इसका दायरा प्रतिवर्ष बढ़ रहा है।

करीब नौ किमी क्षेत्र ग्लेशियर जोन में होने के कारण यहां जमीन के अंदर से रिस रहे पानी से भूस्खलन की समस्या भी बनी हुई है, जो नदी से होकर पड़ाव के समीप तक फैल रहा है। इस समस्या से क्षेत्र में भूमि को व्यापक नुकसान पहुंच रहा है, जो कभी भी बड़े खतरे का कारण बन सकता है। भू-वैज्ञानिक भी नए पड़ावों तक भूस्खलन व भू-कटाव को रोकने के लिए सुरक्षा दीवारों के निर्माण पर जोर देते आ रहे हैं। बावजूद सरकारी सिस्टम सुरक्षा कार्य करना तो दूर, यह भी तय तक नहीं कर पाया है कि क्षेत्र की कब और कैसे सुरक्षा की जाए।

राहत की नहीं जख्म की गारंटी हैं ट्रॉलियां

kedarnath disaster Slow relief
mandakini river in rudraprayag

केदारनाथ आपदा में मंदाकिनी नदी पर बहे झूला पुलों के स्थान पर लगाई गईं ट्रॉलियां लोगों को राहत कम और जख्म ज्यादा दे रही हैं। लोक निर्माण विभाग ने इन ट्रॉलियों को लगाया था। इन ट्रॉलियों ने जहां दो घरों के चिराग बुझा दिए, वहीं कुछ की जिंदगी में हमेशा के लिए अंधेरा भर दिया है। बावजूद इसके शासन व विभाग पुलों के पुनर्निर्माण के बजाय सिर्फ आश्वासन दे रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के निर्देश भी विभागीय अधिकारियों के सामने बौने साबित हो रहे हैं।

16/17 जून 2013 की केदारनाथ आपदा में रुद्रप्रयाग से लेकर सोनप्रयाग तक मंदाकिनी नदी पर केदारघाटी के सैकड़ों गांवों को जोड़ने वाले आठ झूला पुल बह गए थे। इन स्थानों पर लोनिवि ने आपदा के करीब तीन माह बाद हस्तचालित और हाइड्रोलिक ट्रॉलियां लगाई थीं, लेकिन इन ट्रॉलियों से लोगों को सुविधा कम, जख्म ज्यादा मिल रहे हैं। 27 नवंबर 2013 से छह सितंबर 2016 तक इन ट्रॉलियों से 40 से अधिक दुर्घटनाएं घट चुकी हैं।

हादसों में चंद्रापुरी ट्रॉली से एक युवक और विजयनगर में लगी ट्रॉली से तीन वर्षीय स्कूली बच्ची की मौत हो गई थी। अभी तक इन दोनों स्थानों पर 30 से अधिक ग्रामीण घायल हो चुके हैं, जिसमें 11 वर्षीय नेपाली बच्चे का पूरा हाथ कट गया था। ट्रॉलियों से गिरकर घायल हुए कई लोगों का आज भी सरकारी/प्राइवेट अस्पतालों में इलाज चल रहा है।

तत्कालीन जिलाधिकारी डा. राघव लंगर और रंजना द्वारा सचिव लोनिवि को संबंधित अधिकारियों द्वारा बरती जा रही उदासीनता को लेकर तीन बार पत्र भी लिखे गए। लेकिन आज तक पुलों के पुनर्निर्माण को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई गई। ऐसे हालात में अगस्त्यमुनि और ऊखीमठ तहसील के विजयपुर, चंद्रापुरी, स्यालस्यूं, विद्यापीठ और फाटा-रेल क्षेत्र के करीब सौ से अधिक गांवों के ग्रामीण जर्जर हो चुकी ट्रॉलियों के सहारे आवाजाही करने को मजबूर हैं। 

नैली के बीएम भट्ट, विश्वनाथ सिंह, एएस पडियार, राजेंद्र सिंह, हरेंद्र सिंह, सुलोचना देवी आदि का कहना है कि बीडीसी, तहसील दिवस हो, बीते साढ़े तीन वर्षो में पुलों के निर्माण को लेकर कई ज्ञापन प्रेषित किए जा चुके हैं, लेकिन सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं। आपदा में बहे झूला पुलों का निर्माण होगा या नहीं, पहेली बना हुआ है। बीते वर्ष रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे पर चंद्रापुरी व विजयनगर में जनता और जनप्रतिनिधियों द्वारा जाम लगाने के बाद भी शासन, प्रशासन और विभाग ने कार्य में तेजी नहीं दिखाई।

पटरी पर नहीं लौटा लामबगड़ गांव

kedarnath disaster Slow relief
lambabad village

बदरीनाथ हाईवे बैनाकुली से लामबगड़ तक बह गया था। लामबगड़ बाजार भी पूरी तरह अलकनंदा में समा गया था। बदरीनाथ हाईवे का मौजूदा समय में नवनिर्माण हो गया है, लेकिन आपदा के चार साल बाद भी लामबगड़ गांव का जन-जीवन पटरी पर नहीं लौट पाया है। लामबगड़ बाजार में करीब एक दर्जन अस्थायी दुकानें संचालित हो रही हैं, जबकि गांव के लिए जाने वाला पैदल मार्ग अभी भी बदहाल है।

इन स्थितियों के बीच, उर्गम घाटी में कल्पगंगा पर निर्मित झूला पुल जलप्रलय के दौरान बह गया था, जिसे आज तक नहीं बनाया गया है। स्थानीय लोग बल्लियों के सहारे नदी पार कर रहे हैं। वर्ष 2016 में कल्पगंगा पर 80 मीटर लंबे पैदल पुल के निर्माण की स्वीकृति सरकार ने दी थी। इसके लिए पांच करोड़ 71 लाख की धनराशि भी स्वीकृत हुई, लेकिन अब तक पुल निर्माण का कार्य अधूरा है। बदरीनाथ हाईवे पर लामबगड़ भूस्खलन जोन वर्ष 2013 से और भी खतरनाक बना हुआ है। यहां स्थायी ट्रीटमेंट कार्य शुरू तो हो गया है, लेकिन अभी इसे पूर्ण होने में करीब दो वर्ष लग जाएंगे।

भू-धंसाव के कारण दशोली विकास खंड के चमेली गांव में कई आवासीय भवन क्षतिग्रस्त हो गए थे। वर्ष 2013 में तत्कालीन राज्य सरकार ने प्रभावित परिवारों को होटलों में ठहरने के लिए किराया मुहैया कराया था। गांव के कुल 158 परिवारों में से 75 परिवारों का पुनर्वास कर दिया गया है, जबकि 83 परिवार अभी भी पुनर्वास की आस लगाए हैं।

प्रभावितों का कहना है कि प्रशासन उनके आवासीय भवनों को क्षतिग्रस्त नहीं दर्शा रहा है, जबकि उनके मकान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हैं। यही स्थिति आपदा प्रभावित दुर्गापुर, बौंला गांवों की भी है। आपदा प्रभावित राकेश लाल, जगमोहन और महिपाल का कहना है कि कई बार प्रशासन से गांव के पुनर्वास की मांग की गई, लेकिन प्रभावितों की सुनी नहीं जा रही है।

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