केदारनाथ आपदा 2013 : आधुनिक केदारपुरी में प्राचीनता की निशानियों को भी खोज रहे हैं लोग

सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 16 Jun 2020 12:14 PM IST
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kedarnath disaster 2013 : People are also looking for antiquities in modern Kedarpuri
- फोटो : File Photo

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केदारनाथ की 16-17 जून 2013 की महाप्रलय के बाद लोग आज भी केदारनाथ में प्राचीनता की निशानियों को खोज रहे हैं। यह खोज परंपराओं को याद करने की भी है और इस बात की कोशिश भी है कि आधुनिकता में पारंपरिक ज्ञान को भी शामिल किया जाए। 
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केदारनाथ आपदा के भुक्तभोगी आज भी महाप्रलय को याद कर सिहर उठते हैं। भुक्तभोगियों के मुताबिक सब कुछ तबाह होने में मात्र दो मिनट का समय लगा। 16 जून की रात को हुई तबाही में तमाम बड़े गेस्ट हाउस और आधुनिक भवन बह गए थे। रही सही कसर 17 जून को पूरी हो गई, लेकिन मंदिर, मंदिर के आगे नंदी गण, गणेश परिवार बचे रहे। 


लोगों के मुताबिक लगातार तीन दिन की बारिश, चोराबाड़ी ताल का टूटना और पानी के साथ आए मलबे के कारण भारी नुकसान हुआ था। इस महाप्रलय के बाद यह समझ में आया था कि पहाड़ में नदियों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। परंपरागत रूप से नदियों से दूर ही गांव बसते थे। धीरे-धीरे यह सबक भुला दिया।

आज भी प्रदेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती नदियों के बाढ़ क्षेत्र से लोगों को दूर हटाने की है। पुनर्निर्माण के पैकेज में भी इसी सबक को याद रखने की जरूरत है। परंपरागत रूप से पहाड़ का जल प्रबंधन भी बेहतर था। पानी के बहाव को रोकने के लिए कई उपाय किए जाते थे। धान के खेत गांव से दूर होते थे। छानियों को दूर बनाया जाता था।

भूकंप से बचने के लिए बनाए गए कोठी बनाल शैली के छह मंजिला भवनों को आज भी दाद दी जाती है। इस ज्ञान के बावजूद पहाड़ में भवनों के निर्माण में परंपरागत शैली को छोड़ दिया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक यह शैली लोगों ने कई सौ सालों के अनुभव के आधार पर विकसित की थी। 
 
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आज भी खोजते हैं लोग पुरानी निशानियां...

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