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पहाड़ के युवाओं के लिए प्रेरणा बना एक विदेशी

Mon, 23 Dec 2013 11:05 AM IST
मनोज राणा/मुनिकीरेती, ऋषिकेश
मनोज राणा/मुनिकीरेती, ऋषिकेश Updated Mon, 23 Dec 2013 11:05 AM IST
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jimmy inspired uttarakhand youth

कनाडा के पर्यटक जिमी अपनी बोली, भाषा, रहन-सहन, संस्कृति, रीति-रिवाजों से दूर भाग रहे पहाड़ के युवाओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं।

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पहाड़ के ही होकर रह गए
नब्बे के दशक में पहली मर्तबा तीर्थनगरी घूमने आए कनाडा के पर्यटक पहाड़ के ही होकर रह गए। उन्हें न सिर्फ यहां की बोली भाषा से लगाव है, बल्कि गीतों, पकवानों के भी वह बेहद कायल हैं। जिमी हिंदी के साथ ही गढ़वाली में बोलते भी हैं और गीत भी गाते हैं।
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तपोवन के एक गेस्ट हाउस में माहभर से रह रहे 66 वर्षीय जिमी गढ़वाली लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के गानों के दीवाने है। बकौल जिमी मेरे पास नेगी के गीतों के 60 कैसेट्स का संकलन है। मेरे दिन की शुरुआत उनके गानों को सुनकर होती है।

पहाड़ों पर ट्रैकिंग, कैंपिंग पसंद

1982 में पहली बार भारत आए जिमी अब तक तीस बार पहाड़ों पर ट्रैकिंग, कैंपिंग के लिए आ चुके हैं। उन्होंने बताया कि दिसंबर 2009 में यहां आने के बाद मैं अपने मित्र किम और टिहरी के राजा के तत्कालीन सेक्रेट्री सीसी पंवार के साथ पौड़ी घूमने गया था।


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वहां हम लोक गायक नेगी से मिले, उनका संगीत कक्ष देखकर और आवाज सुनकर अच्छा लगा। जिमी कहते हैं कभी सोचा भी नहीं था कि गढ़वाली बोली इतनी खूबसूरत होगी। उन्हें नंदा राजजात यात्रा की एलबम के गीत काफी पसंद हैं।

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कैंपिंग ट्रैकिंग के शौकीन जिमी घनसाली, बुग्याल, त्रिजुगीनारायण, बूढ़ाकेदार, पंचकेदार, कल्पेश्वर, तुंगनाथ, केदारनाथ, हनुमानचट्टी, गंगोत्री आदि कई स्थानों का भ्रमण कर चुके हैं। पेशे से फारेस्ट वैज्ञानिक जिमी विभिन्न खोजों के लिए करीब ढाई हजार बार कैंपिंग और ट्रैकिंग कर चुके हैं।

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उनका कहना है कि गढ़वाली भाषा को प्रोत्साहन के लिए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। युवाओं को अपनी बोली से परहेज नहीं करना चाहिए।

मंडुवे की रोटी, राई का साग पसंद
जिमी गढ़वाली व्यंजनों मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर, कंडाली और राई का साग, मंडुवे की बाड़ी, मठ्ठा, तिल, भांग और पोदीना की चटनी बेहद स्वादिष्ट लगती है। वह अक्सर मंडुवे की रोटी और बाड़ी का सेवन करते हैं।

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